Tuesday, January 12, 2021

स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर विशेष

भारत भूमि पर ऐसे ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाने में सहयोग किया है। 

यही कारण है कि भारत को विश्व गुरु की संज्ञा दी जाती है। इन महापुरुषों के विचार सुनकर जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ये विचार मनुष्य के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करते हैं और सही मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं। 

भारत के इन महापुरुषों में विशेष स्थान रखने वाले  स्"वामी विवेकानंद जी "जिन्होंने अपनी तेजस्वी वाणी से अमेरिका के शिकागो की धरती पर ज्ञान का स्तम्भ खड़ा किया। उनके द्वारा दिया गया वह भाषण आज भी लोकप्रिय है, और हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का आभास कराता है। 

अपने छोटे से जीवन में ही उन्होंने पूरे विश्व में भारत और हिंदुत्व का आभास कराया। प्रेरणा के अपार स्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी की कही एक-एक बात भारतीय युवाओं में ऊर्जा का संचार करती है। उन्होंने भारत की संस्कृति की ओर लौटने का आह्वान किया। जिस से प्रभावित होकर लाखों व्यक्तियों को भारतीय संस्कृति पर गर्व महसूस हुआ ।वर्ष 1893में अमेरिका की शिकागो की धर्म संसद में इन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। शिकागो शहर में विश्व धर्म महासभा का आयोजन उसी वर्ष हुआ। यह एक  "विश्व अमेरिकन प्रदर्शनी "के रूप में थी । इसका मुख्य उद्देश्य मानव की प्रगति को एक स्थान पर एकत्रित करना था । उस प्रदर्शनी में पश्चिमी सभ्यता की उपलब्धियां तथा पिछड़ी संस्कृतियों को बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया था । स्वामी विवेकानंद जी द्वारा विश्व धर्म सम्मेलन से भारत की संस्कृति को अत्यंत लाभ प्राप्त हुआ , लाखों भारतीय और विदेशी लोगों का ध्यान भारत की संस्कृति की ओर गया ।बहुत लोगों ने इस को समझने के लिए वेदों का अध्ययन करना शुरू किया। इस तरह से बहुत से लोगों का मोह पश्चिमी सभ्यता के प्रति भंग हो गया और उन्होने भारत के इतिहास ,भूगोल ,संस्कृति के विषय में जानकारी प्राप्त करना शुरू कर दी । इससे सबसे अधिक हानी अंग्रेजों द्वारा फैलाई जा रही भ्रांतियों को हुआ और देश संगठित होकर स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हुआ ।

 स्वामी विवेकानंद शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करने के पक्षधर थे। उनके अनुसार दूषित शिक्षा प्रणाली के माध्यम से शिक्षित भारतीय युवा  पिता, पूर्वजों, इतिहास एवं अपनी संस्कृति से घृणा करना सीखता है वह अपने पवित्र वेदों ,पवित्र गीता को झूठा समझने लगता है 

 इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली के द्वारा तैयार किए हुए युवा अपने अतीत ,अपनी संस्कृति पर गौरव करने के बदले इन सब से घृणा करने लगता है और विदेशियों की नकल करने में ही गौरव की अनुभूति करता है  । इस शिक्षा प्रणाली के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में कोई भी सहयोग प्राप्त नहीं होता। ऐसी शिक्षा का क्या महत्व है ,जो हम भारतीयों को सदैव परतंत्रता का मार्ग दिखाती है  , जो हमारे गौरव ,स्वावलंबन एवं आत्मविश्वास का क्षरण करती हैं । 

स्वामी विवेकानंद जी के विचार युवाओं में नव स्फूर्ति का संचार करते हैं। उनके अनुसार ज्ञान स्वंय में वर्तमान है मनुष्य उस का आविष्कार करता है ।

पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता,और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं । जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए कहते ,पवित्रता ,धैर्य और उद्यम यह तीनों गुण साथ-साथ होने चाहिए ।

" उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए"


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

Wednesday, January 6, 2021

आत्मविश्वास

 आत्मविश्वास किसी भी व्यक्ति के अंतर्निहित  एक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति रुपी हथियार हैं  जो उसकी रक्षा भी  करती हैऔर सफल जीवन जीने के लिए उत्साहित भी करती है। आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति चिंता रहित होकर भविष्य की योजनाओं में भी सफलता प्राप्त करता है। आत्मविश्वास के बिना जीवन नगण्यता की ओर चला जाता है । हमारी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं हो पाता। व्यक्ति घबराहट में घिरा रहता है ,उसका मन  ही हारा रहता है और हारा हुआ मन कभी क्रियाशील नहीं बन पाता । जीवन में क्रियाशीलता नहीं तो सफलता कैसे ? अतः आत्मविश्वास ही मन की शक्ति है ,प्रेरणा है।  आत्मविश्वास से हमारी संकल्प शक्ति बढ़ती है और संकल्प शक्ति से ही हमारी आत्मिक शक्ति  उपजती है।  उस आत्मशक्ति के बल पर ही हम मेहनत, परिश्रम और अथक प्रयास करते हैं , अपनी योजनाओं को पूर्णता प्रदान करते हैं। आत्मविश्वास की भावना स्वयं पर भरोसा करना सिखाती है। यह आत्मविश्वास ही है जो मनुष्य को कभी बाधाओं के समक्ष झुकने/चूकने नहीं देता । चाहे वह परीक्षा भवन में बैठा हुआ परीक्षार्थी हो या सीमा पर युद्ध लड़ने की लिए तत्पर सैनिक हो । आत्मविश्वास के बिना भीतरी शक्तियां कभी उजागर नहीं हो पाती। अतः जीवन में सफलता पाने के लिए,अपनी शक्तियों का मूल्यांकन करने के लिए आत्मविश्वास बहुत ही जरूरी है।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

"धैर्य"

 "धैर्य" क्रोध रहित या झल्लाहट से हटकर सहनशीलता की वह अवस्था है जब हम  किसी कारणवश दबाव, नकारात्मकता या तनाव का अनुभव करने का लगते हैं , उस अवस्था में जो सहन करने की शक्ति  का हम सहारा लेते हैं उसे धैर्य कहा जाता है ।

 धैर्य मनुष्य की आंतरिक विशेषता है ,न कि नैतिक गुण, यह एक प्रकार का प्रतिरोध है जो मन पर काबू पाने से प्राप्त होता है  और हमारे व्यवहार से इसका परिचय मिलता है,जो हर व्यक्ति के लिए सहज नहीं हो सकती। प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य को शक्ति की कसौटी पर परखा जाता है । कठिन कार्यों के लिए आसान मार्ग निकल आते हैं ।

 धैर्य हमारे चित्त का भाव है,  मानस- पटल पर विचारों की उथल-पुथल अवश्य मचती है लेकिन जब आत्मिक शक्ति उस पर नियंत्रण कर लेती है तो वह धैर्यशीलता कहलाती है । धैर्यशील व्यक्ति कई बार जीवन की जटिलताओं को सुगमता में परिवर्तित कर लेता है । इससे मन को भी शांति मिलती है । लेकिन यह भी देखा गया है, कि धैर्य किसी व्यक्ति की कमजोरी मान लिया जाता है, और अन्य  उसका अनुचित लाभ ले जाते हैं। धैर्य जीवन में उन्नति का साधन भी बन जाता है  क्योंकि कई बार यदि हम धैर्य खो बैठते हैं तो उन्नति के मार्ग से भटक भी जाते हैं । इसलिए धैर्य  को जीवन  कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बनाए रखना आवश्यक बन जाता है ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

मानसिक शांति

 "मानसिक शांति" से बड़ा सुख कोई हो ही नहीं सकता। वास्तव में  "मानसिक शांति" संतोष का वह भाव है जो  हमारे चित्त को तृष्णा से विमुख करता है । 

मगर विडंबना यह है कि  मनुष्य जीवन की सफलता तृष्णा को आधार बनाकर ही मानता है । यह अंतहीन लालसा संतोषी भाव की परम शत्रु रही है।

 गाड़ी, बंगला, अकूत धन संपत्ति  होते हुए भी  आज व्यक्ति का मन इतना अशांत क्यों रहता है ? सब कुछ होते हुए भी मानसिक शांति कोसों कोसों दूर है। इसका सीधा सरल उत्तर यही है कि  मनुष्य सदैव  इच्छाओं से घिरा हुआ, लोभी, लालची और संग्रही प्रवृत्ति का रहा है । अत्याधिक भौतिक सुख सुविधाओं से युक्त होकर भी वह अच्छा स्वास्थ्य नहीं खरीद पाया। महंगी दवाइयां और महंगे इलाज उसके जीवन की बैसाखियां बनी हुई है । केवल धन और सुख सुविधाओं को जुटाने वाला व्यक्ति मानसिक शांति क्यों नहीं जुटा पाया? क्योंकि  तृष्णा से उसका माेह कभी खत्म नहीं हुआ । यही उसकी बेचैनी ,उसकी अशांति का सबसे बड़ा कारण है । जीवन में  मानसिक शांति और संतोष पाने के लिए  स्वार्थों का भी परित्याग आवश्यक है । महर्षि गौतम ने कहा भी है :- 

असंतोषं परं दुखं संतोष: परमं सुखम्।

 सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् संतुष्ट: सततं भवेत्।।

  अतः इस संसार में असंतोष ही सबसे बड़ा दुख है और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है  जिसे "मानसिक शांति" का आधार माना गया है । भले ही मनुष्य ने  आज ज्ञान विज्ञान और शक्तियों का उपयोग करके अनेकाें सुखों के साधन प्राप्त कर लिए हैं लेकिन फिर भी सुख की कल्पना सदैव अधूरी ही रहती है ,क्योंकि इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती हैं, ये अनंत है और यही इच्छाएं मनुष्य के दुख का कारण बनती है । अत:  इच्छाओं ,तृष्णाओं, कामनाओं का अंत केवल संतोषी भाव ही कर सकता है , तभी मानसिक शांति मिलती है ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

हिमाचल की लोक संस्कृति के संदर्भ में श्री राम


 हिमाचल के लोक संस्कृति के संदर्भ में 'श्री राम'के आख्यान, व्याख्या, लोकप्रियता,शिक्षा, आदर्शों काआम जन जीवन पर क्या प्रभाव है, 'श्री राम' के जीवन चरित्र को जनमानस ने किस प्रकार अपनाया है, तथा प्रभावशाली बन पड़ा है। यह सब जानने से पहले लोक संस्कृति से अभिप्राय की जानकारी आवश्यक है।----- लोक से अभिप्राय सर्वसाधारण जनता से है जिसकी व्यक्तिगत पहचान न होकर सामूहिक पहचान है । समस्त लोक समुदाय का मिलाजुला रूप लोक कहलाता है ।संस्कृति की बात करें  तो वह ब्रह्मा की भांति अवर्णनीय है  । वह व्यापक अनेक तत्व का बोध कराने वाले  जीवन के विविध प्रवृत्तियों से संबंधित है  विभिन्न अर्थों व भावों में उसका प्रयोग होता है ।मानव मन की बाहरी  प्रवृत्ति मूलक प्रेरणा से जो कुछ विकास हुआ है उसे सभ्यता कहते हैं और उसके अंतर्मुखी प्रवृत्ति से जो कुछ बना है उसे संस्कृति कहते हैं ।इन सब की मिली जुली संस्कृति लोक संस्कृति कहलाती हैं। लोक जीवन की जैसी सरलतम, नैसर्गिक ,अनुभूतिमयी अभिव्यंजना का चित्रण लोक गीतों व लोक कथाओं में मिलता है वैसा अन्यत्र सर्वदा दुर्लभ है क्योंकि लोक साहित्य में लोक मानव का हृदय बोलता है, प्रकृति भी स्वंय गाती गुनगुनाती है लोक जीवन में कदम कदम पर लोक संस्कृति के दर्शन होते हैं।

 भगवान 'श्री राम' हिंदुओं के आराध्य देव है। हिमाचल लोक संस्कृति का अध्ययन यदि किया जाए तो यहां की जीवन शैली पर पूर्णरूपेण श्रीराम के जीवन आदर्शों का प्रभाव है। पर्व त्योहारों में राम की स्तुति की जाती है भजन गीत गाए जाते हैं घर-घर राम की पूजा की जाती है। दशहरा पर्व पर राम के विजय गीत गाए जाते हैं। यह पर्व राम जैसे गुण आदर्शों को अपनाने की शिक्षा देता है। हिमाचल की लोक संस्कृति में दिवाली त्योहार का विशेष महत्व है। मां लक्ष्मी के साथ-साथ श्री राम सीता लक्ष्मण हनुमान समेत पूजन होता है। हिमाचल में राम मंदिरों की महिमा अनुपम है। इसके अलावा घर-घर रामायण पाठ होते हैं। रामायण के प्रति हिमाचल वासियों के हृदय में गूढ़ आस्था है। हिमाचल लोक संस्कृति से जुड़े कुछ उद्धारण है-----

1. रहन-सहन और खान-पान-  भगवान श्री राम बनवासी राम है उनका बनवासी जीवन लोगों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ जाता है। शुद्ध सात्विक आहार से ही आत्मा पवित्र होती है। सादा रहन-सहन सादगी का संदेश देता है। योगी सन्यासियों का पहनावा शुद्ध आचरण का संदेश देता है। बहुत सारे लोकगीत ऐसे हैं जिनमें श्री राम का सादगी भरा जीवन दिखाया गया है-जैसे- --वन में दो सन्यासी बालक घूम रहे, सुंदर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी....... 

हाथ सजे हैं धनुष बाण,

लगते हैं कोई राजकुमार, 

पर क्यों बन में घूम रहे हैं, 

सुन्दर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी......... 

कंद मूल खाए रहे निहार,

बनफूल सजे गल की माल,

पर कुटिया में क्यों रह रहे,

सुंदर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी............. 

2. शादी ब्याह में--- हिमाचल लोक संस्कृति में, ग्रामीण हो चाहे शहर राम सीता के नाम से ही गीतों की शुरुआत होती है। दूल्हे की सेहराबंदी हो या हो लड़की की विदाई  गीतों में रस भर दिया जाता है।

जैसे- आज राम चले सीता ल्यावण, परम सौभागी सीता ल्यावण,आज राम चले....... 

विदाई पर ---राम साथ लगन लग्या जी, जीवन भर का साथ मिल्या जी, वेटिये घर जाओ अपणे........ 


जन्म संस्कारों और नाम संस्कारों में------ हिमाचल लोक संस्कृति में राम को उच्च आदर्शों वाला महापुरुष माना जाता है इसीलिए यदि किसी के घर में बच्चे का जन्म होता है तो राम की कृपा ही मानी जाती हैं राम गीत गाए जाते हैं बच्चे के नामकरण में राम शब्द अवश्य जुड़ जाता है ।जैसे-  रामशरण ,राममूर्ति, रामलाल रामपाल आदि। अधिकतर राम के पर्यायवाची शब्द ही देखे जाते हैं।

गीत- कौशल्या घर राम जन्में है खुशियों का दिन आया, कौशल्या घर राम जन्में है खुशियों का दिन आया।

 शुभ चिन्हों के रूप में--- 'राम 'का नाम ही अपने आप में महान है। हिमाचल की लोक संस्कृति में लोग अपने मुख्या दरवाजों के ऊपर गेट के ऊपर राम का चित्र अवश्य लगाते हैं । नए घर में प्रवेश श्रीराम के मंगल गीतों से ही किया जाता है।

घर घर में रामायण पाठ---  हिमाचल लोक संस्कृति में अधिकतर राम आदर्शों को अपनाया जाता है लोग घरों में रामायण पुस्तक रखते हैं सुबह शाम बड़ी श्रद्धा से उसका पूजन करते हैं। हर वर्ष रामनवमी को मंदिरों की भांति घरों में भी रात्रि जागरण किया जाता है राम की महिमा का गुणगान किया जाता है। राम के भक्त हनुमान को भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा जाता है। क्योंकि हनुमान एक आदर्श सेवक, भक्त रहे हैं।


भ्यागड़ा के गीत --प्रातः काल तड़के गाया जाने वाला गीत भ्यागड़ा होता है ।लोग अधिकतर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आदर्श मान कर ये गीत गाते है। सर्य की पहली किरण निकलने से पहले अंधेरे अंधेरे में इस गीत में राम की शिक्षाओं की व्याख्या सुंदर लय में की जाती है। प्रातः समय पर उठने के महत्व को भी दर्शाया जाता है। 

इसके अलावा हिमाचल की लोक संस्कृति में दशहरा ,रामलीला विशेष महत्व रखते हैं। कुल्लू का दशहरा अंतरराष्ट्रीय पर्व है जिसमें राम के जीवन चरित्र पर विशेष ध्यान प्रकाश डाला गया है। उनके आदर्शों में श्रेष्ठ संस्कार है जो सभी को अपनाने चाहिए। हर जिलों में रामलीला का आयोजन होता है राम की विजय गाथा दोहराई जाती है। कुछ सुदूर उच्च पहाड़ी इलाकों में रामलीला में कुछ भिन्नता पाई जाती है । सीता को कहीं रावण की पुत्री माना जाता है। यही कारण था कि रावण के कैद में सीता को रावण द्वारा स्पर्श तक नहीं किया गया । यह प्रसंग अद्भुत रामायण में वर्णित है कि दंडकारण्य में गृत समद नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी इच्छा थी कि वह देवी लक्ष्मी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करें। अपनी कामना की पूर्ति के लिए वह रोजाना कलश में कुश के अग्रभाग से मंत्रों के उच्चारण के साथ दूध डालता था। उस समय देव असुरों का युद्ध चलता रहता था। रावण युद्ध करता करता उस ब्राह्मण की कुटिया तक पहुंच गया। उसने उस ब्राह्मण की हत्या करके उसका रक्त उस कलश में डाल दिया। कलश लेकर मंदोदरी के पास पहुंचा और कहा कि इस कलश को संभाल कर रखो इसमें विष है। मंदोदरी रावण के बुरे कर्मों से दुखी रहती थी एक दिन उसने उस कलश में रखे द्रव्य को पी लिया और वह गर्भवती हो गई। जब उसे यह ज्ञात हुआ तो उसने उस भ्रूण को खेत में दबा दिया। भ्रूण कलश में था जो राजा जनक के हल से कन्या रूप में प्रकट हुआ । इसी से सीता का जन्म माना जाता है। रावण परम शिव भक्त था, उसने यह भी प्रतिज्ञा ले रखी थी की पुत्री सदृश्य किसी युवती पर जब भी बुरी नजरडालूं तो उसका अंत हो जाए। यही कारण था कि उसने सीता को छुआ तक नहीं। ये सारी कथाएं हिमाचल लोक संस्कृति में रामलीला के दौरान दोहराई जाती है । 

 अतःराम  जन-जन में है कण कण में है हर मन में है ,हिमाचल की लोक संस्कृति में है सब के आराध्य है ।घर-घर में पूजे जाते हैं ,उनके आदर्श शिक्षा हिमाचल लोक संस्कृति के जीवन आधार है।

' जय श्री राम '🙏🙏

शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

2020 की विनती

 


जाते जाते मैं विनय कर जाऊं 

मुझे इतना भी बुरा न समझना


मैने ही धर्म की परिभाषा बदली 

मैने ही संस्कृति का पाठ पढ़ाया 


शहरों को  काले  धुंयें  से  बचाया 

प्रकृति को भी सौन्दर्यवान बनाया 


खण्ड खण्ड बिखरे उन रिश्तों को

इक छत के  नीचे  रहना  सिखाया


आना जाना  बंद  बन गई मजबूरी 

संपर्क सूत्रडिजिटल जाल बिछाया


भारत  के  हर अजनबी  कोने को

जाना समझा चिरपरिचित बनाया 


दशकों से मैली  ,नदियों का पानी 

निर्मल स्वच्छ शुद्ध पवित्र बनाया 


 ब्रह्मांड प्रदूषित विषधूल कणों से 

खूब  निखारा  पर्यावरण  बचाया


मानव को सजा  मिली  कर्मों  की

2020 मुफ्त में  बदनाम  कराया।


2021हर झोली खुशियां भर जाये 

आहत जो मन प्रफुल्लित हो जाये


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

लोहड़ी पर्व

 


लोहरी पर्व अति पवित्र,

        पहचान हमारी संस्कृति की।


 पौष मास का अंतिम दिन, 

        और सक्रांति माघ मास की।


तमिल में पोंगल,कर्नाटक 

          केरल में सक्रांति कहलाए।


असम भोगाली ,विहू हरियाणा,                                           

            पंजाब में माधी कहलाए।


 उत्तर प्रदेश खिचड़ी, राजस्थान                                                                 ।             में उत्तरायणी कहलाए।


वर्ष का प्रथम त्योहार,

            समाहित अनेकों कथाएं।


दुल्ला भाटी था इक डाकू,

               पर पंजाब का नायक।


चोरी कर बांटे गरीबों को, 

             यही था उसको जायज।


 सुंदरी मुंदरी दो बहने,

               चाचा से थी शिकायत।


दोनों को बेच राजा को, 

              बनना चाहता था रईस।


 पता चला दूल्हा भाटी को,

               माना दुख बड़ा उसने।


दोनों बहनों का ब्याह रचाया, 

।            कन्यादान किया उसने।


 कुछ नहीं था देने को,

          सेर शक्कर बांध दी उसने।


बिकने से बच गई बहनें,         

     पिता का फर्ज निभाया उसने।


चाहे कथाएं कैसी भी हो,

       जोड़ती प्यार और ममता से।


भिन्न उमंगे, निराली प्रथाएं,

        बांधती एक भाव समता से।


आओ सभी यह पर्व मनाए,

            जीवंत रखें संस्कृति को।


शुभ भावों से सिंचन करें,

        इस मानव संचित कृति को।



शीला सिंह

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

विश्व हिंदी दिवस

 

हर वर्ष  10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है ।विश्व हिंदी दिवस का मुख्य उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना और हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है  ।  हिंदी के प्रति अनुराग पैदा करना  तथा हिंदी की दशा  सुधारने के लिए जागरूकता पैदा करना ताकि हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।  

विश्व में हिंदी का विकास हो इसीलिए इसे प्रचारित ,प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिंदी सम्मेलनो की श्रृंखला आरंभ की गई , जिसकी पहल  तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने की थी  ।अतः प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को प्रचार समिति "वर्धा " के सहयोग से नागपुर में आयोजित हुआ था जिसमें प्रसिद्ध समाजसेवी एवं स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे ने अपना विशेष संदेश भेजा । इस दिन को बड़े उत्साह  से विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।  भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने  2006 से10 जनवरी को  प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी  । इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश  में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिंदी दिवस मनाया था ।

 इसके अलावा  देश  भर के सभी सरकारी कार्यालयों ,विश्वविद्यालयों में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ताकि हिंदी भाषा को और समृद्ध बनाया जा सके । राष्ट्रीय स्तर पर  14 सितंबर को हर वर्ष  हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है । यह दिवस हिंदी के सम्मान में समर्पित होता है और हिंदी भाषा को ज्यादा से ज्यादा व्यवहार में लाने, सरकारी कार्यालयों में  प्रयोग किए जाने पर जोर दिया जाता है  । अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा की और तरक्की हो इसलिए विश्व के सैंकडो़ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा़ती है । पूरी दुनिया में करोड़ों लोग हिंदी भाषा बोलते हैं और भलीभांति समझ भी जाते हैं दुनिया भर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली पाँच भाषाओं में से एक हिंदी भाषा है । हिंदी भाषा पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाए, इसका खूब प्रचार-प्रसार हो, प्रयास होता रहेगा। क्योंकि हिंदी भाषा अनेकता में एकता को स्थापित करने की सूत्रधार है ।हिंदी भाषा की समृद्धता  अति आवश्यक है।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मानव जीवन की यही कहानी

 "मानव जीवन यही कहानी 

   "सदियों से जानी मानी"

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दिन चढ़ा उल्लासित मन,

                  स्फूर्ति तन अंगों पर।

रवि रश्मि छटा,

                 विखरी तुंग श्रृंगों पर।

नव संदेश पा हर्षित, 

                 वसुधा सात रंगों पर।

सरका इक और दिन,

                दैनन्दिनी के पन्नों पर।



 भोरकाल दिवाकर शैशव, 

             सौम्य बचपन दिखाकर।

 पहुंच काल दुपहरी,

                 सौष्ठव योवन पाकर। 

 पश्चिम उतरता सूरज,

                 ढलती उम्र बता कर।

 पल पल बढ़ता पल,

             चलता हर पल घटाकर।



 रिश्तो की पकड़ में जकड़ा,

             कर्ज़ों का बोझ उठाकर।

 जलता मोह ज्वाला नित, 

               मन में मंसूबे पूर्ण कर।

 जनम जनम की भटकन,

          नीरस माया अंधा बनकर।

 बन सगा जो हितकर,

           ठग जाये अपना बन कर।



अनादि अनादि से उलझे धागे,

            कोई न गया सुलझा कर।

यहीं पाया यहीं पर खोया

       अच्छी बुरी पहचान बनाकर।

 बंद मुट्ठी प्रकट जमीं पर

      चला सूनें हाथ पूंजी बनाकर।

सृष्टि रचना पालक करें,

      पूर्ण सभी अभिनय निभाकर।



शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

श्री राम की नीतियां

 'श्रीराम की संघात्मक, संगठनात्मक और व्यवस्थापक नीति '

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 श्री 'राम ' चंद्र जी वन यात्रा में जन जन की सद्भावना को जीतते हुए उन्हें  सूत्र में बांधते हुए चलते हैं ,उनमें सहयोग वृत्ति जागृत करते चलते हैं


 ।  भगवान राम सहयोग देने और प्राप्त करने में कुशल है। वे प्रेम भावना ,उच्चस्तरीय संवेदना के आधार पर जन भावना को सूत्रबंद करते हैं । 

 ऋषि बनचर के अतिरिक्त गीध राज को भी अपना सहयोगी बना लेते हैं  ।

इसी सहयोग भाव तथा संवेदना जनक सामाजिक दृष्टिकोण में ही गिधराज जटायु को शहीदों में अग्रणी बना दिया । 


श्री राम को सीता के संबंध में पहले जानकारी उसी से मिली । 

श्री राम की सहयोग और संगठन वृत्ति ही सफलता के द्वार खुद ही खुलते चले गए  । 

रीछ वानरों को संगठित करके वह सीताजी जी की खोज करने और असुरों के विरुद्ध वातावरण तैयार करने में समर्थ हुए ।


 उनके संगठन में भांति भांति के वानर सम्मिलित थे  ।जहां सामूहिकता और संगठन की शक्ति है वहां बड़े से बड़े काम आसानी से हो जाते हैं ।


वानर संख्या में अधिक नहीं थे अपितु  उनमें सामूहिकता की वृत्ति तथा अनीति के प्रतिरोध के सामाजिक उत्तरदायित्व की बुद्धि भी प्रखरता से जाग चुकी थी , इसलिए समुद्र पर पुल बनाने जैसा कठिन कार्य भी उन्होंने आसानी से कर दिया ।


 रीछ वानराें की संघ शक्ति और सहयोग वृत्ति अद्भुत थी  ।सामूहिक सहयोग के बल पर राक्षसों का विनाश हुआ ।


 भगवान राम ने भरत के लिए भी यही संदेश छोड़ा था कि सामूहिक हित और सहयोग को ध्यान में रखकर चलें  ।गुरु वशिष्ट से भी यही आग्रह करते हैं।


  वन में रहते हुए वनवासियों के प्रति भी 'श्री राम ' प्रेम का भाव भरते हैं जब कोल भील मिलते हैं तो वह उन सब को सम्मान देते हैं और सामाजिक गौरव का बोध कराते हैं ।


 श्री 'राम ' कहते हैं कि व्यवस्थात्मक उत्तरदायित्व जिस किसी पर भी हो उसे सामूहिकता की मर्यादा अवश्य बनाकर रखनी चाहिए ।उससे परस्पर  स्नेह भाव भी बढ़ता है तथा अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी हल भी निकाले जा सकते हैं ।

 व्यवस्थापक ही नहीं सामान्य नागरिक तथा कार्यकर्ता भी यदि सामूहिकता का लाभ उठाने के अभ्यस्त हो तो विषम परिस्थितियों में भी मार्ग निकाल लेते हैं ।

  रामचरितमानस से सामाजिक दृष्टिकोण, सहयोग और संगठन की महत्ता समझकर प्रेरणा लेकर यदि हम इस दिशा में सक्रिय हो सके तो कठिन से कठिन बाधाओं को पार करते हुए सुख शांति एवं समृद्धि युक्त आदर्श समाज की स्थापना करने में सफल हो सकते हैं ।


'जय श्री राम' ।

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बाल कविता

 

 कौआ छत पर काँय काँय करता 

अतिथिआने का समाचार सुनाता

कोरोना अतिथि जब से आ गया 

सब अतिथियों को भगा है दिया।


कौवा तुम ऐसी बाणी रोज सुनाना

नाना नानी मामा मामी को बुलाना

बहुत  दिन, बंद हुआ आना जाना

 सुन्दर परियों की कहानी सुनाना।



 कोरोना  जब से बना है महमान 

 घर  में दुबके सोए  चादर  तान

खेलना कूदना  बंद जीना मुहाल

घर बना स्कूल मोबाइल पर काम।


 वो  खुशहाल  दिन  कब  आएंगे

संग  दोस्तों के  स्कूल हम जाएंगे

मस्ती  करेंगे  खूब  नाचेंगे  गाएंगे

बुरे वक्त को अब अच्छा बनाएंगे।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

माता पिता की वंदना

 

नित बंदन उन माता-पिता को,

जिन ये मानव -जन्म दिलाया।

 दुख  कष्ट  प्रसन्न  चित्त  झेले,

 दी प्यार ममता की मधुर छाया।


वो "मां "का प्यारा -प्यारा आंचल, 

बसती थी जिसमें खुशियां अपार।

रक्षण करे पिता की सजग आँखें, 

मृदु डाँट में छुपा था प्यार-दुलार।


अभावों कीभनक कभी छू न पाई,

नित पूरी फरमाईशों  की  बौछार।

आत्म व्यथा  रही परदे में  समाई ,

आत्मजों समक्ष न किया इजहार।


कुटुम्ब हितार्थ  सर्व जीवन  जिया,

सपनें संजो कर हर्ष संग्रह  किया।

न माथे पर शिकन न हृदय प्रपंची,

हर शिकवा ज्यों रस अमृत पिया।


तुम सृष्टि में श्रेष्ठ देव अर्चन भरू,

प्रकटें नभ रवि नित बंदना करूं 

तुम पालक मैं सेवा संकल्प चरूं, 

हर जन्म यही  कामना मन धरूं।

 

शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले


    सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका समाज सुधारिका, स्त्रियों ,बालिकाओं के अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली, इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली ,मराठी कवयित्री को उनकी जयंती पर उन्हें शत शत नमन करती हूं । 

 उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है । उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को नायगांव (पुणे) हुआ था। इनके पिता का नाम खंदोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सन 1840 में उनका विवाह ज्योतिराव गोबिन्दराव फुले जी से हो गया ,जिन्होंने इनके उच्च विचारों का मान रखा और हर कदम इनका साथ दिया। 

सावित्रीबाई को उनके पति का भरपूर सहयोग मिला और इन्होंने सन 1848से

1852 ई. में बालिकाओं के लिए विद्यालयों की स्थापना का पुण्य काम शुरू करने का प्रयास किया । सन 1852 ई.  में  सभी जातियों /श्रेणियों की बालिकाओं /स्त्रियों के लिए किसान विद्यालय की स्थापना की ।सावित्रीबाई इस पहले किसान स्कूल की संस्थापक और प्रिंसिपल बनी । 

यहीं से सावित्री बाई के जीवन को एक मिशन की तरह जीने का उद्देश्य मिल गया। पति के सहयोग से उन्होंने अनेकों सामाजिक बुराइयों को दूर करने का संकल्प रखा। विधवा विवाह करवाना ,छुआछूत मिटाना ,दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना, रूढ़ि परंपराओं से महिलाओं को मुक्ति दिलाना  मुख्य  लक्ष्य रहा । उन्होंने उस समय की तुच्छ ग्रामीण मानसिकता तथा परिस्थितियों का डटकर सामना किया । उस समय स्त्रियों /दलितों /दलित महिलाओं की   दशा अति दयनीय थी ।

 इतनी विकृत सामाजिक व्यवस्था में बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना तो पाप के बराबर था । ऐसे समय में सावित्रीबाई जी ने कितनी हिम्मत का काम किया , जिसकी जितनी सराहंना की जाए कम है। 

सावित्रीबाई पूरे देश के लिए किसी महानायिका से कम नहीं है। बालिकाओं के लिए  उस समय स्कूल चलाना  कितना मुश्किल रहा होगा इसकी कल्पना  शायद आज भी नहीं की जा सकती है। उस समय लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी थी ।जब वह स्कूल जाती थी तो गांव के विरोधी लोग उसे गालियां देते, पत्थर फेंकते ,गोबर फेंकते, लेकिन उन्होंने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया,और अपने मिशन को जारी रखा। अपने थैले में एक अलग पोशाक डाल कर ले जाती थी, ताकि लोगों द्वारा फेंके गए कीचड़ वाले कपड़ों को बदल सके। उनके पति महात्मा ज्योतिबा को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। तत्कालीन सरकार ने इन्हें सम्मानित भी किया ।समाज को बदलने ,सुधारने में इस  जुझारू, दृढ़संकल्पी ,आदर्शवादी दंपत्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । समाज में एक नई सोच पैदा करने में इन महान विभूतियों का अमूल्य योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकेगा ,सदैव स्मरण किया जाएगा🙏🙏


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

कांटो की राह मुझे चलने दो

 

अभि तो जीवन में भोर हुआ 

                 जरा मुझे संभलने दो

सफलता डगर आसान नहीं 

             जाँच परख पग धरने दो

पुष्पदल अकर्मण्य न बना दें

       काँटों की राह मुझे चलने दो।



मन में जो सपनें पाले हैं मैंने 

              साकार उनको करने दो

नभ शीर्ष स्पर्श तमन्ना के 

            पंखों में जान तो भरने दो

उड़ने दो उन्मुक्त गगन में 

       काँटों की राह मुझे चलने दो।



न डर हो आँधी तूफानों से 

         विपरीत दिशा से भिड़ने दो

झूझ जाऊं कठिन झोंकों से 

             हवा का रूख बदलने दो

मंजिल मिले ही तब जाकर 

       काँटों की राह मुझे चलने दो। 

 


रुढ़ि परिपाटी को तोड़ पाऊं 

       मन हिम्मत मशाल जलने दो

सदियों से बंधी पाँव बेड़ियां 

            उन जंजीरों को तोड़ने दो

मुकद्दर लिखूं निज हाथ से

       काँटों की राह मुझे चलने दो।



 प्रेरणा बने आने वाले कल की

                ऐसा उद्धरण करने दो

 इतिहास साक्षी बन जाए 

           ऐसा जीवनचरित रचने दो

यश सुगन्ध फैले चहुं ओर 

       काँटों की राह मुझे चलने दो। 


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

2020 के खट्टे तीखे अनुभव

 

2020 तुम कितने निष्ठुर बने रहे 

अपनो में शामिल बेगाने बने रहे। 

चिन्ता पीड़ा देकर इतराते ही रहे 

धीमी धीमी चाल गम बरसाते रहे।


 

क्या मानव के पाप कर्म का फल 

या धर्म विमुखता का परिणाम था

कैसा  ये  भयंकर  ज्वार  सैलाबी 

या विनाशी आंधी तूफान चक्र था।



कामगारों के रोजगार भी छूट गये 

बच्चों  की छूटी  नियमित  पढाई 

दरवाजे  के भीतर  थे  कैद सभी 

जीव हर पल मांगे मौत से रिहाई।



मंहगाई शीर्ष पर चौपट सारे धंधे 

सड़क पर मजदूर भूखे प्यासे नंगे

महामारी से त्रस्त, पुलिस के डंडे

दारून वक्त,न जाने नकली फंडे।



सीमा प्रहरी सेवापथ पर न्योछावर

आपदा झेले हर भारती बन कातर 

काल चला असंख्य ग्रास बनाकर 

विध्वंस,दूषित हवा, भू पर आकर



वर्ष अन्त  में दुविधा बड़ी दुखारी

इक महामारी दूजे आन्दोलनकारी

अनशन पर  बैठा  जग  हितकारी 

देश अन्नदाता  चिरकाल उपकारी।



अब आने वाले वर्ष की प्रतीक्षा है 

खुशियां बरसे चहंओर कामना है 

खट्टे तीखे पलों को भी भुलाना है 

हर मन में खुशी के दीप जगाना है 


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏 



महाभारत की कुंती

 

कुछ न पाकर भी,

                     थी वह स्वामिनी।

कौरव पांडव के 

                     हृदय की सम्राज्ञी।

मगर पति प्यार 

                     से वंचित , ग्रसित।

जामाता कृत्यों से 

                    भी लज्जित  बनी।

हस्तिनापुर कीशक्ति

                       वो साहसी नारी।

जीवन कथा संघर्षों में 

                      पीड़ा झेली भारी।

 देव आह्वान मंत्र

               दुर्वासा ऋषि से पाया।

रति आसक्ति बंचित 

                 पर ममत्व पूर्ण पाया।

माता-पिता का दुलार

                   मिल न पाया प्यार।

 कुंती भोज की गोद

                आंगन की कली बनी।

कौमार्यावस्था में सूर्य देव 

                  का वरदान पा गई ।

विवाहपूर्व कुन्ती

             अप्रकट मां कहला गई।

तीन निज दो सौत के

          पांच वत्ससुता कहला गई।

प्रथम आत्मज पर

                    चिर रहस्य छा गई।

सदैव उपेक्षित कर्ण 

                   ममता छांव से दूर ।

सूतपुत्र कहलाया

                अपमान सहा भरपूर।

माता कुंती लोकलाज 

            की करती रही रखवाली।

निज वत्स से आत्मजों 

          की प्राण रक्षण हितशाली।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

'यादों में बसी यादें'


जब भी उन वादियों से गुजरूं याद तुम्हारी आती है,

टूटीफूटी पगडंडियां एहसास तुम्हारा करा जाती है।

ऊंचे ऊंचे पेड़ों की छांव मन को सुकून देती थी,

ठंडी ठंडी हवा पसीने की बूंदों को सुखा देती थी।

कभी उछलती, कूदती आंखों से ओझल हो जाती थी,

 तुम्हारे चेहरे पर  चिंता की लकीरें खिंच जाती थी।

फिर जोर की आवाज ,डांट मुझे लगाती थी,

बड़ी जिद्दी बार-बार वही गलती दोहराती थी।

पकड़ उंगली ,पीछे पीछे घर चली आती थी ।

वर्ष बीते बचपन बीता पेड़ों के झुरमुट भी वहीं हैं 

शीतल समीर बहते झरनों की ध्वनी भी वही है ।

लगता कोई पीछे से अब भी पुकार रहा है,

 नटखट बचपन को कोई अब भी 

डांट रहा है ।

मुड़कर देखूं कोई नहीं बस इक गूंज लौट रही थी,

 ये मन का वहम था मां अपने सच्चे घर चली गई थी। 



शी़ला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

बीते वर्ष में क्या खोया क्या पाया और नए वर्ष से अपेक्षाएं




 हे आने वाले वर्ष 

         उम्मीदों के फूल खिलाना।

बीते वर्ष जो घाव

          लगे मरहम जरूर लगाना।

गम के साये में जिये 

               अब खुशियां बरसाना।

जिस पीड़ा को झेला

                  वो स्मरण न कराना। 

कैसे रूकेंगे उस मां के अश्रु, 

               लाल वतन पर कुर्वान।

अपाहिज हुआ बढ़ापा,

              तन कंकलऔर बेजान। 

बहन की राखी राह 

               ताकेगी दिन और रात।

बौराई कुल नवयौवना 

         जिसका छूटा जीवन साथ। 

संकट में हर प्राण,कोरोना

                प्रकटा जब झपटमार।

लील गया कई जीवन 

                   करके भयंकर वार।

समय की टेढ़ी चाल 

             से जीना हो गया दुश्वार।

टूट गया संग अपनों का 

              और छूट गया परिवार ।

हे ईश, सृष्टि नियामक, 

                   जग के पालनहार ।

नववर्ष बने मंगलकारी 

                  एसा वरदान दे देना।

उदास नीरस नैनों में 

               हर्ष किरण फैला देना। 

सहारे जिनके छूट गये 

                  अवलंब  बन जाना। 

उल्लास हों चहुंओर ब्रह्मांड

                   आलोक कर जाना। 

काली तम निशा बाद अब 

        आमोद किरण फैला जाना। 


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

महाभारत की द्रौपदी



यज्ञ कुंड से जन्मी वो यज्ञसेनी थी    

महाभारत नायिका वो द्रोपती थी

पूर्वजन्म मुद्गल ऋषि की पत्नि थी

फिर द्रुपद पुत्री ,वो अग्निसुता थी।



अल्पायु पतिप्राण तजे ब्यथित हुई

शिव घोर स्तुति शुभवर हेतु हीभई 

पाँच गुण सम्पन पति वरदानी हुई

कथन पंचम दोहराया वो चूक हुई



 स्वयंवर में जीता अर्जुन ने उसको 

मांआशीश ने पांचो में बांटाउसको

अर्जुन ने हृदयप्रेयसी माना उसको

निज धर्म कर्म सत्य भान जिसको



इक इक कर जब सब जुए में हारे

दांव पर बलि बेबसपतियों के मारे

क्या कुछ न सहा हर हृदय कांपा,

मान मर्यादा टूटी,बंधन नियम सारे



भरी सभा में चीरहरण हुआउसका

सभी कुटुम्बी,कोईसहाई न उसका          

कर जोड़ इज्ज़त की भीख मांगी

बेहयाई  पर  जोर न चला उसका।



आये प्रभु लाज बचाने द्रौपदी की

वो सखी जिसे मानते, द्रौपदी थी

अन्तहीन वस्त्रछोर दुशासन हारा

कुल विनाशी प्रारम्भ की घड़ी थी। 



यज्ञ कुंड कन्या घोर श्राप दे गई

अंही कौरवकुल विध्वंस कर गई

नारी मान भंग दुःसाहस जो करे

वो महाभारत की रचना कर गई। 



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

जीवन कैसे जीना है

 




जीवन ईश्वर का दिया हुआ अनमोल तोहफा है, जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। 'इसे काटना नहीं जीना है'और वह भी जिंदादिली से। हर व्यक्ति अपने जीवन में खुशी चाहता है जीवन खुशहाल बना रहे, इसलिए खुशी के मौकों को बटोरने की चेष्टा रहनी चाहिए। जीवन में सुख दुख निरंतर चलते रहते हैं। दुखो का सामना भी करना पड़ता है। मगर खुशहाल जीवन के लिए खुशियों को इकट्ठा करना पड़ता है। दुखो का सामना करेंगे तभी सुख काअनुभव करेंगे। कुछ लोग दुख के समय किस्मत को दोष देते हैं, यह भी गलत है। क्योंकि कुछ हद तक दुख आत्म जनित होते हैं । उन से बाहर आने का प्रयास भी होना चाहिए। दुखी मानसिकता चिंताओं को जन्म देती है। चिंता व्यक्ति को अंदर ही अंदर से खाती रहती है और जिंदा लाश बना देती है अतः चिंता से दूर रहैं । हमेशा खुश रहे। दुखों को हंसते हुए बर्दाश्त करेंगे तो चिंता नहीं  बढ़ेगी । दूसरों की सहायता करना भी अपना स्वभाव बनाएं क्योंकि जितनी खुशी हमें दूसरों की सहायता करने से मिलती है उतनी खुशी खुद की सहायता करने से नहीं मिलती । हंसना ,मुस्कुराना भी जीवन में खुशियां प्रदान करता है। यह एक अमूल्य स्वभाव है चेहरे पर प्रसन्नता रहेगी तो मन भी प्रसन्न रहेगा। आज आम आदमी को जीवन यापन करना कितना मुश्किल हो गया है। जीवन निर्वाह के लिए धन जुटाना पड़ता है भागदौड़ करनी पड़ती है अतः शारीरिक क्षमता बनाए रखने के लिए और मानसिक शांति हेतु  व्यायाम, योग, ध्यान आदि का सहारा लेना चाहिए । क्योंकि जब हमारा शरीर स्वस्थ रहेगा तो तनाव कम होगा और हम तंदुरुस्त बनेंगे । प्यार करना और प्यार बांटना जीवन में खुशियां लाता है।प्यार भरा जीवन प्रसन्नता का आधार है। सदैव सकारात्मक सोच रखें ,क्रोध ना करें क्षमा का भाव रखने से मनुष्य का आत्म सम्मान बढ़ता है।  तनाव कम हो ,इसके लिएअच्छी अच्छी जगहों जैसे -धार्मिक स्थानों, पर्यटन स्थलों में भी कभी कभार घूम लेना चाहिए। दुख युक्त  अतीत की बातों को भुला कर वर्तमान में जीवन जीना चाहिए। अपने दोस्तों ,प्रियजनों के साथ जितना हो सके समय बताएं। कुछ लोग अपनी कमियों को आंकने का काम करते हैं। अपनी कमियों का विश्लेषण करना कोई बुरी बात नहीं है मगर हीन भावना नहीं आनी चाहिए। हमारी सोच ही हमारे जीवन में बदलाव लाती है। सदैव अच्छा सोचे, जीवन के प्रति अच्छा नजरिया रखें, खुशियां आती जाएंगी जीवन खुशहाल बनता रहेगा। धन्यवाद

"You're only here for a short visit.  don't hurry, don't worry. And be sure to smell the flowers along the way."

Walter Hagen 

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शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

बाल कविता


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'अब पिकनिक कहां मनाए'

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मां अब पिकनिक कहां  मनाए

कोरोना फैला खेलने कहां जाएं


घर की चारदीवारी में ऊब गए हैं

ऑनलाइन क्लास नैन थक गए हैं


 मन  करता  मैं बड़े मैदान  जाऊं

 दोस्तों  संग  मैं खेलूं मौज उड़ाऊं


 बाल  से  खेलूं उछलता  ही जाऊं

 खूब  मजे  करूं मैं  हंसू  हंसाऊ। 



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

नूतन वर्ष क्या लाया

 


नूतन वर्ष आया ,

        उम्मीदों की सौगात लाया ।

2020 में थी जो, 

         संकटो कष्टों की तम छाया। 

समय चक्र झेला, 

         कुछ  खोया तो कुछ पाया। 

कैसी अशुद्ध पवन,

          अब तक समझ न आया।



कोई प्राण से हारा 

            बेबस तड़पे क्षीण काया 

मुंह निवाला छिना,

           जेब से रूठी भागी माया।

नूतन वर्ष आया, 

          उम्मीदों की सौगात लाया।



अपनों से दूरी बनी,

           मति भ्रम,संदेह भरमाया।

वक्त निष्ठुर काल बन 

           हल्के हल्के पग चलआया

नूतन वर्ष आया, 

          उम्मीदों की सौगात लाया।



 नव वर्ष करें स्वागत 

          चाहतों का पिटारा फैलाया

हर इक मन में 

          आशा किरण दीप जलाया

नूतन वर्ष आया 

          उम्मीदों की सौगात लाया।



संकट दूर हटेगा 

            मन गीत अब गुनगुनाया

बीता न लौटे कभी 

             यही भाव सब उपजाया

नूतन वर्ष आया ,

          उम्मीदों की सौगात लाया।



खुशियों के फूल,

              कलियों ने रूप सजाया

प्रकृति पुनः उद्धार,

              नवल सृजन अब आया   

नूतन वर्ष आया 

          उम्मीदों की सौगात लाया।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

कोरोना काल का प्रभाव


  जैसा कि विषय है, के करोना काल में  इस विषम परिस्थितियों में भारत में क्या-क्या कार्य किए तथा बच्चे जो विद्यालय नहीं जा रहे हैं ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं उनकी शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ा, उन बच्चों की मानसिक स्थितियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा जो अपने दोस्तों से नहीं मिल पा रहे हैं ,खेलकूद में शामिल नहीं हो रहे हैं वो बच्चे कैसा महसूस कर रहे हैं । इस विषय पर मैं अपनी राय प्रस्तुत करती हूं--

 कोरोना जिसने वैश्विक महामारी का रूप ले रखा है , महत्वपूर्ण या यूं कहें की अनोखी सीख दे गई । कोविड-19 के दौरान जब सरकार की ओर से लॉकडाउन के आदेश हुए सभी अपने अपने घरों में रहे ,क्योंकि तेजी से फैलती बीमारी से सामाजिक दूरी ही कुछ हद तक कम कर सकती है ।दफ्तर ,स्कूल , कामकाजी स्थान सभी बंद हो गए  ।बाजार में खाद्य वस्तुओं के अलावा सब कुछ बंद ।लॉकडाउन में सीमित समय के लिए ढील दी जाती रही। परिवार के सभी सदस्य जो दूर दूर कार्यरत थे ,अपने घर लौट आए, एक छत के नीचे जिंदगी बसर होती रही। घर का कामकाज मिलाजुला रहा। दिनभर की सही रूपरेखा तैयार की गई । योग , व्यायाम , संगीत , पौधारोपण व उनकी देखभाल , घर की साफ सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया ।कोरोना को दूर भगाने तथा रोग प्रतिरोधक ऊर्जा को बनाए रखने के प्रयास किए गए । एक संपन्न परिवार जो जीवन यापन में पूर्ण सामर्थ्यवान है ,उसे करोना काल में इतनी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा होगा , जितनी दिहाड़ीदार मजदूर, फैक्ट्रियों ,होटलों, कारखानों में काम करने वाले कामगारों को । जब नौकरी छिन जाती है तो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित होना पड़ता है । कोविड-19 के दुष्परिणाम इसी वर्ग को ज्यादा भुगतने पड़े। यह महामारी एक और अमूल्य सीख दे रही है कि मुश्किल समय के लिए बचत बहुत जरूरी है । संकट की इस घड़ी में हमने परोपकार की भावना को भी सीखा ।दूसरों का दुख बांटने/ दूर करने का प्रयास भी किया ।करोना काल में व्यक्ति ईश्वरीय शक्तियों पर भी विश्वास करने लगा , उसके मन में आध्यात्मिक भाव जागृत होने लगे । लोभ, माेह ,अहंकार और दंभ सब झूठे लगने लगे, पैसा गौण हो गया ,स्वास्थ्य मुख्य हो गया  ।जीवन में अनोखा परिवर्तन आ गया। आज आदमी आदमी से डरता है ना जाने किस में यह करोना नाम की बला विद्यमान है । सबसे ज्यादा बच्चों की पढ़ाई/मानसिकता प्रभावित हुई।

आनलाइन  शिक्षा दी जाने लगी। बहुत से माता-पिता बच्चों की पढ़ाई में इस तरह की परेशानी से जूझ रही है। एक सर्वे के मुताबिक हर पांच में से दो माता पिता के पास बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज के सेटअप के लिए जरूरी सामान भी नहीं है । उनके पास कंप्यूटर , टेबलेट, महंगे फोन, प्रिंटर जैसी चीजें नहीं है । आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ऑनलाइन पढ़ाई में कहीं पीछे छूटते दिख रहे हैं। कई ग्रामीण, दूरदराज इलाकों में इंटरनेट की समस्या होती है जो ऑनलाइन पढ़ाई में बाधा बनती है । अतः ऑनलाइन पढ़ाई में चुनौतियां बहुत है। आज सभी इन समस्याओं से भलीभांति परिचित है। बच्चे अपने घरों में सीमित होकर रह गए हैं ,खेलकूद छूट गया है, दोस्तों के साथ मस्ती, घूमना फिरना, पार्टी करना सब कुछ खत्म है । बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं। आने वाले समय में यदि करोना साथ-साथ चला  तो इसी के साथ जीवन दिनचर्या बनाने का प्रयास करना पड़ेगा। इसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। बच्चों के मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक  क्षमता पर इसका प्रभाव पढ़ रहा है । माता-पिता व परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे किस प्रकार बच्चों का मनोबल बनाए रखने में सफल होते हैं।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

'ताजमहल' हुनर का कत्ल



   

  

 

लोग कहते प्यार की निशानी है ताजमहल, 

मैं कहती बेगुनाहों की कुर्बानी है ताजमहल।



ताजमहल की खूबसूरती वो आंसू अब भी टपक रहे, 

जिनके असंख्य किस्से इसके गर्भ में सिसक रहे। 



वर्षों वर्षों की मेहनत हर नक्काशी  में खिली है, 

सफेद संगमरमरी पत्थरों में श्रम की बूंदें मिली है। 



खून पसीना बहा कर जिन्होंने ये ताजमहल बनाया, 

बड़ी शिद्त से अपने हुनर का वो परचम लहराया। 



कहाँ मालूम हाथ का हुनर क्या उपहार लेकर आयेगा 

खूबसूरत*ताज*निर्दयी प्यार की बलि चढ़ जायेगा ।



नहीं भुला पाया वक्त उन गहरी चीखों, चित्कारों को, 

ठूंठ बना कर रख दिया, कुशल कामगारों को।



अपने शिल्पी ज्ञान पर था गर्व और गरूर जिनको, 

वो वरदान नहीं अभिशाप बन निगल गया जिनको। 



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मंजिल एक हजारों राहें




 मैं तुम्हें कैसे पाऊं भगवन 

ये मन तो भोगी जीवन चाहे

कैसे पाऊं मैं परम लक्ष्य को

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 


कभी लालच कूप गिर जाऊं

मन लोभी धन संचय चाहे ,

कैसे समझांऊं ये सब नश्वर 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 


ईर्ष्या पालू नफरत फैलाऊं

मन किसी का आहत चाहे 

कैसे भगवन  मार्ग  मिलेंगे, 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें।



अपनी ख़ुशी में मस्त सदा 

अपनी ही चिन्ता पाले रहें 

भगवन कृपा मिले न ऐसे 

मंजिल एक हजारों हैं राहें। 



प्रेम भक्ति के उपासक जन 

प्रभु प्रीत जो  ही सदा चाहे

करते सिमरन शद्ध भाव से 

प्रभु मिल जाते उसी भाव से। 

मन भटकन से निकलना चाहे 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मां भारती का लाल किसान

 'किसान दिवस पर विशेष 

         


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 क्यों भटक रहा देश का किसान,

आज सड़कों पर ये क्या हो रहा? 


मिट्टी को बनाया है जिसने सोना,  मां भारती का लाल क्यों रो रहा?


कितनी पीड़ा से आहत है बेबस,  सब  कुछ  आज  वह  झेल रहा।


क्यों और कैसे बनकर बेदर्द कोई, उस की भावनाओं से यूं खेल रहा।


मेहनत से प्रीत लगाई, मेहनत ही उसका सच्चा मंहगा गहना रहा है।


कर्मठ,बलिष्ठ सदा लक्ष्य रहा पर

केवल कष्ट को सहता ही रहा है। 


बारह मास परिश्रम करता है डट कर खूब वह अनाज  उगाता  है ,


फिर क्यों आज  बैठ चौराहे  पर वह तपि दुःख ही दुःख पाता है ।


कभी बाढ़ ,कभी सूखा हर त्रासदी निज तन पर  दुर्गति को पेल रहा। 


समय बीता सदियां बीती, नियति का भी चलता यहां यही खेल रहा।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

बाल कविता

 


        "चंदा मामा"

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चंदा मामा ठंड में क्यों विचरते हो 

क्या तुम  सर्दी से  नहीं डरते  हो?

ठंड लगेगी तो बिमार पड़ जाओगे

अपनी मम्मी से फिर डांट खाओगे


हर रोज घूमते हो उन्मुक्त गगन में 

बादलों  के  बीच  तारों के संग  में

कभी छुपते ,कभी चमकते पल में 

कभी भीगते नहाते वर्षा के जल में 



कभी  तो ले  लेते आकार विशाल

सुन्दर इतने ,गोल चांदी  का  थाल

सिकुड़ते, फैलते, कैसा मायाजाल

सदियां बीती, बीते असंख्य साल।



जबसो जाऊं तब गगन में आते हो

प्रातः होते ही कहां  चले जाते हो?

पास नहीं आते  मामा कहलाते हो

आंख मिचौली खेल,खेल जाते हो


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

अंतरराष्ट्रीय प्रवासी दिवस पर कविता

 

         समय का चक्र

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बदलता परिवेश छूटता सहारा

समय का चक्र,  भाग्य का मारा

सड़कों पर रोता मजदूर बेचारा

पैदल चल -चल  प्राण भी  हारा।



बच्चे रहे  बिलखते  भूखे प्यासे

बेबस नयनन थे कातर रूआंसे

कड़कती धूप और नंगे पांवो से

प्राण भी छूटे ममता की छाँव से।



खाने  को अन्न  न  जेब में  पैसा ठूंठे हाथ कर्म बिन वक्त ये कैसा 

चारों  दिशाओं  में  पसरा अंधेरा

सपने टूटे तन बना काठमूर्त जैसा




पेट काट-काट, टका-टका संजोया

मेहनत कर बरसों कासपना खोया

तिल-2 तिनका घरौंदा था  बनाया 

आखिरी सांस में भीकाम न आया



 नियति  ने  ये कैसा  खेल रचाया

स्नेह न जाने कहाँ जाकर भगाया 

सन्देह हर मन भीतर अब समाया 

वैश्विकमहामारी ने हरइक रूलाया ।

शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस


नौ नवंबर इतिहास में स्वर्णिम दिवस आया है 

उत्तराखंड स्थापना दिवस जो पाया है ।

करें इस धरा को नमन पवित्र धरा को नमन ।

सुंदर मन मोहिनी यह पावन धरती है।

अल्मोड़ा का सौंदर्य नैनादेवी छटा

 निराली है।

 बागेश्वर की महिमा कितनी प्यारी और अपार है।

चूमते आकाश बांस बुरांसअनोखा विस्तार है।

बद्रीनाथ का धाम चमोली को देता   शोभा है। 

गोपेश्वर और हेमकुंड भी सुंदरता बरसाता है।

अद्भुत सौंदर्य से गूंधी फूलों की घाटी है

तप कुंड विष्णुप्रयाग पंच प्रयाग

दिव्य माटी है।


लीची  के  बागों से  सजी  मसूरी रानी है।

देहरादून इसकी गौरवमयी राज                       धानी है।

अंग्रेजों की सत्ता देखो यहां कई निशानी है।

अति पवित्र और पावन तीर्थ  ये    हरिद्वार है।

शिव कीजटा से बहती गंगा की धार है।

पंचेश्वर  देवीधुरा और सिखों का गुरुद्वारा

नागनाथ का  मंदिर  सुंदर बड़ा नजारा है।

झीलों  संग  सजा  हुआ प्यारा नैनीताल है।

चाइना पीक देखो यहां चोटी तो    बेमिसाल है।

सौंदर्य विखेरे अति सुंदर तल्ली मल्ली ताल है।

 पौड़ी जिला  तो उत्तराखंड की जान है।

नागर्जा का मंदिर  जालपा  मां विराजमान है।

बिंसर महादेव तारा कुंड भी तो इसका प्राण है।

उल्कादेवी मंदिर पिथौरागढ़ सीमा       का प्रहरी है।

रायगुफा अनोखी  छटा  भटकोट हनुमानगढ़ी है। 

अलकनंदा मंदाकिनी और संगम रुद्रप्रयाग  है।

अगस्त्यमुनि गुप्तकाशी कालीमठ मद्महेश्वर तुंगनाथ है। 

सुरकंडा चंद्रबदनी कुंजापुरी होती जयकार है।

गब्बर सिंह चंद्र सिंह माधो सिंह वीरों की धरती है।

श्री देव सुमन टिहरी जिला में पीर पलती है। 

चैती मंदिर गिरी सरोवर नानक माता धाम है ।

इतिहास के पन्नों में इस सुंदर धरती का नाम है।

नमन करूं शीश झुकाऊं पावन धरा को आज मैं,

जितना हो वर्णन कम है अनुपम दिव्य धाम ये।।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏


अज्ञात सत्ता

 

          


 नमन करुं  उस सत्ता को

 जिसका  हृदय  दर्पण  है,

जगती  भावों  की ज्योति

 श्रद्धा   सुमन  अर्पण  है।



पल  पल का  व्याख्यान 

संजोए अपने  पास  है ,

अच्छे बुरे कर्म का संग्रह 

पाई पाई का हिसाब है।

नमन करूं उस सत्ता को

जिसका हृदय दर्पण है,

जगती भावों की ज्योति

श्रद्धा  सुमन  अर्पण है।



 आदि न अंत सृष्टि  बेअन्त

उसकी माया अपरंपार  है,

आवत- जावत धरा गृह सम

लाख चौरासी योनि जन्म है।

नमन  करूं  उस सत्ता  को

 जिसका  हृदय   दर्पण  है,

जगती  भावों   की  ज्योति

 श्रद्धा   सुमन  अर्पण   है ।



अक्षय  विशाल नभमण्डल 

रवि  शशि नक्षत्र संसार  है,

नश्वर  मानव जगत  केवल 

बालू  कण  मिथ्य सार  है।

नमन  करूं उस  सत्ता को 

जिसका  हृदय  दर्पण  है ।

जगती  भागों  की ज्योति

 श्रद्धा  सुमन  अर्पण  है ।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...