हिमाचल के लोक संस्कृति के संदर्भ में 'श्री राम'के आख्यान, व्याख्या, लोकप्रियता,शिक्षा, आदर्शों काआम जन जीवन पर क्या प्रभाव है, 'श्री राम' के जीवन चरित्र को जनमानस ने किस प्रकार अपनाया है, तथा प्रभावशाली बन पड़ा है। यह सब जानने से पहले लोक संस्कृति से अभिप्राय की जानकारी आवश्यक है।----- लोक से अभिप्राय सर्वसाधारण जनता से है जिसकी व्यक्तिगत पहचान न होकर सामूहिक पहचान है । समस्त लोक समुदाय का मिलाजुला रूप लोक कहलाता है ।संस्कृति की बात करें तो वह ब्रह्मा की भांति अवर्णनीय है । वह व्यापक अनेक तत्व का बोध कराने वाले जीवन के विविध प्रवृत्तियों से संबंधित है विभिन्न अर्थों व भावों में उसका प्रयोग होता है ।मानव मन की बाहरी प्रवृत्ति मूलक प्रेरणा से जो कुछ विकास हुआ है उसे सभ्यता कहते हैं और उसके अंतर्मुखी प्रवृत्ति से जो कुछ बना है उसे संस्कृति कहते हैं ।इन सब की मिली जुली संस्कृति लोक संस्कृति कहलाती हैं। लोक जीवन की जैसी सरलतम, नैसर्गिक ,अनुभूतिमयी अभिव्यंजना का चित्रण लोक गीतों व लोक कथाओं में मिलता है वैसा अन्यत्र सर्वदा दुर्लभ है क्योंकि लोक साहित्य में लोक मानव का हृदय बोलता है, प्रकृति भी स्वंय गाती गुनगुनाती है लोक जीवन में कदम कदम पर लोक संस्कृति के दर्शन होते हैं।
भगवान 'श्री राम' हिंदुओं के आराध्य देव है। हिमाचल लोक संस्कृति का अध्ययन यदि किया जाए तो यहां की जीवन शैली पर पूर्णरूपेण श्रीराम के जीवन आदर्शों का प्रभाव है। पर्व त्योहारों में राम की स्तुति की जाती है भजन गीत गाए जाते हैं घर-घर राम की पूजा की जाती है। दशहरा पर्व पर राम के विजय गीत गाए जाते हैं। यह पर्व राम जैसे गुण आदर्शों को अपनाने की शिक्षा देता है। हिमाचल की लोक संस्कृति में दिवाली त्योहार का विशेष महत्व है। मां लक्ष्मी के साथ-साथ श्री राम सीता लक्ष्मण हनुमान समेत पूजन होता है। हिमाचल में राम मंदिरों की महिमा अनुपम है। इसके अलावा घर-घर रामायण पाठ होते हैं। रामायण के प्रति हिमाचल वासियों के हृदय में गूढ़ आस्था है। हिमाचल लोक संस्कृति से जुड़े कुछ उद्धारण है-----
1. रहन-सहन और खान-पान- भगवान श्री राम बनवासी राम है उनका बनवासी जीवन लोगों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ जाता है। शुद्ध सात्विक आहार से ही आत्मा पवित्र होती है। सादा रहन-सहन सादगी का संदेश देता है। योगी सन्यासियों का पहनावा शुद्ध आचरण का संदेश देता है। बहुत सारे लोकगीत ऐसे हैं जिनमें श्री राम का सादगी भरा जीवन दिखाया गया है-जैसे- --वन में दो सन्यासी बालक घूम रहे, सुंदर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी.......
हाथ सजे हैं धनुष बाण,
लगते हैं कोई राजकुमार,
पर क्यों बन में घूम रहे हैं,
सुन्दर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी.........
कंद मूल खाए रहे निहार,
बनफूल सजे गल की माल,
पर कुटिया में क्यों रह रहे,
सुंदर सलोने दो बालक घूम रहे हैं जी.............
2. शादी ब्याह में--- हिमाचल लोक संस्कृति में, ग्रामीण हो चाहे शहर राम सीता के नाम से ही गीतों की शुरुआत होती है। दूल्हे की सेहराबंदी हो या हो लड़की की विदाई गीतों में रस भर दिया जाता है।
जैसे- आज राम चले सीता ल्यावण, परम सौभागी सीता ल्यावण,आज राम चले.......
विदाई पर ---राम साथ लगन लग्या जी, जीवन भर का साथ मिल्या जी, वेटिये घर जाओ अपणे........
जन्म संस्कारों और नाम संस्कारों में------ हिमाचल लोक संस्कृति में राम को उच्च आदर्शों वाला महापुरुष माना जाता है इसीलिए यदि किसी के घर में बच्चे का जन्म होता है तो राम की कृपा ही मानी जाती हैं राम गीत गाए जाते हैं बच्चे के नामकरण में राम शब्द अवश्य जुड़ जाता है ।जैसे- रामशरण ,राममूर्ति, रामलाल रामपाल आदि। अधिकतर राम के पर्यायवाची शब्द ही देखे जाते हैं।
गीत- कौशल्या घर राम जन्में है खुशियों का दिन आया, कौशल्या घर राम जन्में है खुशियों का दिन आया।
शुभ चिन्हों के रूप में--- 'राम 'का नाम ही अपने आप में महान है। हिमाचल की लोक संस्कृति में लोग अपने मुख्या दरवाजों के ऊपर गेट के ऊपर राम का चित्र अवश्य लगाते हैं । नए घर में प्रवेश श्रीराम के मंगल गीतों से ही किया जाता है।
घर घर में रामायण पाठ--- हिमाचल लोक संस्कृति में अधिकतर राम आदर्शों को अपनाया जाता है लोग घरों में रामायण पुस्तक रखते हैं सुबह शाम बड़ी श्रद्धा से उसका पूजन करते हैं। हर वर्ष रामनवमी को मंदिरों की भांति घरों में भी रात्रि जागरण किया जाता है राम की महिमा का गुणगान किया जाता है। राम के भक्त हनुमान को भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा जाता है। क्योंकि हनुमान एक आदर्श सेवक, भक्त रहे हैं।
भ्यागड़ा के गीत --प्रातः काल तड़के गाया जाने वाला गीत भ्यागड़ा होता है ।लोग अधिकतर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आदर्श मान कर ये गीत गाते है। सर्य की पहली किरण निकलने से पहले अंधेरे अंधेरे में इस गीत में राम की शिक्षाओं की व्याख्या सुंदर लय में की जाती है। प्रातः समय पर उठने के महत्व को भी दर्शाया जाता है।
इसके अलावा हिमाचल की लोक संस्कृति में दशहरा ,रामलीला विशेष महत्व रखते हैं। कुल्लू का दशहरा अंतरराष्ट्रीय पर्व है जिसमें राम के जीवन चरित्र पर विशेष ध्यान प्रकाश डाला गया है। उनके आदर्शों में श्रेष्ठ संस्कार है जो सभी को अपनाने चाहिए। हर जिलों में रामलीला का आयोजन होता है राम की विजय गाथा दोहराई जाती है। कुछ सुदूर उच्च पहाड़ी इलाकों में रामलीला में कुछ भिन्नता पाई जाती है । सीता को कहीं रावण की पुत्री माना जाता है। यही कारण था कि रावण के कैद में सीता को रावण द्वारा स्पर्श तक नहीं किया गया । यह प्रसंग अद्भुत रामायण में वर्णित है कि दंडकारण्य में गृत समद नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी इच्छा थी कि वह देवी लक्ष्मी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करें। अपनी कामना की पूर्ति के लिए वह रोजाना कलश में कुश के अग्रभाग से मंत्रों के उच्चारण के साथ दूध डालता था। उस समय देव असुरों का युद्ध चलता रहता था। रावण युद्ध करता करता उस ब्राह्मण की कुटिया तक पहुंच गया। उसने उस ब्राह्मण की हत्या करके उसका रक्त उस कलश में डाल दिया। कलश लेकर मंदोदरी के पास पहुंचा और कहा कि इस कलश को संभाल कर रखो इसमें विष है। मंदोदरी रावण के बुरे कर्मों से दुखी रहती थी एक दिन उसने उस कलश में रखे द्रव्य को पी लिया और वह गर्भवती हो गई। जब उसे यह ज्ञात हुआ तो उसने उस भ्रूण को खेत में दबा दिया। भ्रूण कलश में था जो राजा जनक के हल से कन्या रूप में प्रकट हुआ । इसी से सीता का जन्म माना जाता है। रावण परम शिव भक्त था, उसने यह भी प्रतिज्ञा ले रखी थी की पुत्री सदृश्य किसी युवती पर जब भी बुरी नजरडालूं तो उसका अंत हो जाए। यही कारण था कि उसने सीता को छुआ तक नहीं। ये सारी कथाएं हिमाचल लोक संस्कृति में रामलीला के दौरान दोहराई जाती है ।
अतःराम जन-जन में है कण कण में है हर मन में है ,हिमाचल की लोक संस्कृति में है सब के आराध्य है ।घर-घर में पूजे जाते हैं ,उनके आदर्श शिक्षा हिमाचल लोक संस्कृति के जीवन आधार है।
' जय श्री राम '🙏🙏
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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