Tuesday, January 12, 2021

स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर विशेष

भारत भूमि पर ऐसे ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाने में सहयोग किया है। 

यही कारण है कि भारत को विश्व गुरु की संज्ञा दी जाती है। इन महापुरुषों के विचार सुनकर जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ये विचार मनुष्य के लिए एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करते हैं और सही मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं। 

भारत के इन महापुरुषों में विशेष स्थान रखने वाले  स्"वामी विवेकानंद जी "जिन्होंने अपनी तेजस्वी वाणी से अमेरिका के शिकागो की धरती पर ज्ञान का स्तम्भ खड़ा किया। उनके द्वारा दिया गया वह भाषण आज भी लोकप्रिय है, और हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का आभास कराता है। 

अपने छोटे से जीवन में ही उन्होंने पूरे विश्व में भारत और हिंदुत्व का आभास कराया। प्रेरणा के अपार स्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी की कही एक-एक बात भारतीय युवाओं में ऊर्जा का संचार करती है। उन्होंने भारत की संस्कृति की ओर लौटने का आह्वान किया। जिस से प्रभावित होकर लाखों व्यक्तियों को भारतीय संस्कृति पर गर्व महसूस हुआ ।वर्ष 1893में अमेरिका की शिकागो की धर्म संसद में इन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। शिकागो शहर में विश्व धर्म महासभा का आयोजन उसी वर्ष हुआ। यह एक  "विश्व अमेरिकन प्रदर्शनी "के रूप में थी । इसका मुख्य उद्देश्य मानव की प्रगति को एक स्थान पर एकत्रित करना था । उस प्रदर्शनी में पश्चिमी सभ्यता की उपलब्धियां तथा पिछड़ी संस्कृतियों को बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया था । स्वामी विवेकानंद जी द्वारा विश्व धर्म सम्मेलन से भारत की संस्कृति को अत्यंत लाभ प्राप्त हुआ , लाखों भारतीय और विदेशी लोगों का ध्यान भारत की संस्कृति की ओर गया ।बहुत लोगों ने इस को समझने के लिए वेदों का अध्ययन करना शुरू किया। इस तरह से बहुत से लोगों का मोह पश्चिमी सभ्यता के प्रति भंग हो गया और उन्होने भारत के इतिहास ,भूगोल ,संस्कृति के विषय में जानकारी प्राप्त करना शुरू कर दी । इससे सबसे अधिक हानी अंग्रेजों द्वारा फैलाई जा रही भ्रांतियों को हुआ और देश संगठित होकर स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हुआ ।

 स्वामी विवेकानंद शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करने के पक्षधर थे। उनके अनुसार दूषित शिक्षा प्रणाली के माध्यम से शिक्षित भारतीय युवा  पिता, पूर्वजों, इतिहास एवं अपनी संस्कृति से घृणा करना सीखता है वह अपने पवित्र वेदों ,पवित्र गीता को झूठा समझने लगता है 

 इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली के द्वारा तैयार किए हुए युवा अपने अतीत ,अपनी संस्कृति पर गौरव करने के बदले इन सब से घृणा करने लगता है और विदेशियों की नकल करने में ही गौरव की अनुभूति करता है  । इस शिक्षा प्रणाली के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में कोई भी सहयोग प्राप्त नहीं होता। ऐसी शिक्षा का क्या महत्व है ,जो हम भारतीयों को सदैव परतंत्रता का मार्ग दिखाती है  , जो हमारे गौरव ,स्वावलंबन एवं आत्मविश्वास का क्षरण करती हैं । 

स्वामी विवेकानंद जी के विचार युवाओं में नव स्फूर्ति का संचार करते हैं। उनके अनुसार ज्ञान स्वंय में वर्तमान है मनुष्य उस का आविष्कार करता है ।

पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता,और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं । जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए कहते ,पवित्रता ,धैर्य और उद्यम यह तीनों गुण साथ-साथ होने चाहिए ।

" उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए"


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

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