Wednesday, January 6, 2021

मंजिल एक हजारों राहें




 मैं तुम्हें कैसे पाऊं भगवन 

ये मन तो भोगी जीवन चाहे

कैसे पाऊं मैं परम लक्ष्य को

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 


कभी लालच कूप गिर जाऊं

मन लोभी धन संचय चाहे ,

कैसे समझांऊं ये सब नश्वर 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 


ईर्ष्या पालू नफरत फैलाऊं

मन किसी का आहत चाहे 

कैसे भगवन  मार्ग  मिलेंगे, 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें।



अपनी ख़ुशी में मस्त सदा 

अपनी ही चिन्ता पाले रहें 

भगवन कृपा मिले न ऐसे 

मंजिल एक हजारों हैं राहें। 



प्रेम भक्ति के उपासक जन 

प्रभु प्रीत जो  ही सदा चाहे

करते सिमरन शद्ध भाव से 

प्रभु मिल जाते उसी भाव से। 

मन भटकन से निकलना चाहे 

मेरी मंजिल एक हजारों राहें। 



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

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