"मानसिक शांति" से बड़ा सुख कोई हो ही नहीं सकता। वास्तव में "मानसिक शांति" संतोष का वह भाव है जो हमारे चित्त को तृष्णा से विमुख करता है ।
मगर विडंबना यह है कि मनुष्य जीवन की सफलता तृष्णा को आधार बनाकर ही मानता है । यह अंतहीन लालसा संतोषी भाव की परम शत्रु रही है।
गाड़ी, बंगला, अकूत धन संपत्ति होते हुए भी आज व्यक्ति का मन इतना अशांत क्यों रहता है ? सब कुछ होते हुए भी मानसिक शांति कोसों कोसों दूर है। इसका सीधा सरल उत्तर यही है कि मनुष्य सदैव इच्छाओं से घिरा हुआ, लोभी, लालची और संग्रही प्रवृत्ति का रहा है । अत्याधिक भौतिक सुख सुविधाओं से युक्त होकर भी वह अच्छा स्वास्थ्य नहीं खरीद पाया। महंगी दवाइयां और महंगे इलाज उसके जीवन की बैसाखियां बनी हुई है । केवल धन और सुख सुविधाओं को जुटाने वाला व्यक्ति मानसिक शांति क्यों नहीं जुटा पाया? क्योंकि तृष्णा से उसका माेह कभी खत्म नहीं हुआ । यही उसकी बेचैनी ,उसकी अशांति का सबसे बड़ा कारण है । जीवन में मानसिक शांति और संतोष पाने के लिए स्वार्थों का भी परित्याग आवश्यक है । महर्षि गौतम ने कहा भी है :-
असंतोषं परं दुखं संतोष: परमं सुखम्।
सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् संतुष्ट: सततं भवेत्।।
अतः इस संसार में असंतोष ही सबसे बड़ा दुख है और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है जिसे "मानसिक शांति" का आधार माना गया है । भले ही मनुष्य ने आज ज्ञान विज्ञान और शक्तियों का उपयोग करके अनेकाें सुखों के साधन प्राप्त कर लिए हैं लेकिन फिर भी सुख की कल्पना सदैव अधूरी ही रहती है ,क्योंकि इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती हैं, ये अनंत है और यही इच्छाएं मनुष्य के दुख का कारण बनती है । अत: इच्छाओं ,तृष्णाओं, कामनाओं का अंत केवल संतोषी भाव ही कर सकता है , तभी मानसिक शांति मिलती है ।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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