"धैर्य" क्रोध रहित या झल्लाहट से हटकर सहनशीलता की वह अवस्था है जब हम किसी कारणवश दबाव, नकारात्मकता या तनाव का अनुभव करने का लगते हैं , उस अवस्था में जो सहन करने की शक्ति का हम सहारा लेते हैं उसे धैर्य कहा जाता है ।
धैर्य मनुष्य की आंतरिक विशेषता है ,न कि नैतिक गुण, यह एक प्रकार का प्रतिरोध है जो मन पर काबू पाने से प्राप्त होता है और हमारे व्यवहार से इसका परिचय मिलता है,जो हर व्यक्ति के लिए सहज नहीं हो सकती। प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य को शक्ति की कसौटी पर परखा जाता है । कठिन कार्यों के लिए आसान मार्ग निकल आते हैं ।
धैर्य हमारे चित्त का भाव है, मानस- पटल पर विचारों की उथल-पुथल अवश्य मचती है लेकिन जब आत्मिक शक्ति उस पर नियंत्रण कर लेती है तो वह धैर्यशीलता कहलाती है । धैर्यशील व्यक्ति कई बार जीवन की जटिलताओं को सुगमता में परिवर्तित कर लेता है । इससे मन को भी शांति मिलती है । लेकिन यह भी देखा गया है, कि धैर्य किसी व्यक्ति की कमजोरी मान लिया जाता है, और अन्य उसका अनुचित लाभ ले जाते हैं। धैर्य जीवन में उन्नति का साधन भी बन जाता है क्योंकि कई बार यदि हम धैर्य खो बैठते हैं तो उन्नति के मार्ग से भटक भी जाते हैं । इसलिए धैर्य को जीवन कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बनाए रखना आवश्यक बन जाता है ।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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