"मानव जीवन यही कहानी
"सदियों से जानी मानी"
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दिन चढ़ा उल्लासित मन,
स्फूर्ति तन अंगों पर।
रवि रश्मि छटा,
विखरी तुंग श्रृंगों पर।
नव संदेश पा हर्षित,
वसुधा सात रंगों पर।
सरका इक और दिन,
दैनन्दिनी के पन्नों पर।
भोरकाल दिवाकर शैशव,
सौम्य बचपन दिखाकर।
पहुंच काल दुपहरी,
सौष्ठव योवन पाकर।
पश्चिम उतरता सूरज,
ढलती उम्र बता कर।
पल पल बढ़ता पल,
चलता हर पल घटाकर।
रिश्तो की पकड़ में जकड़ा,
कर्ज़ों का बोझ उठाकर।
जलता मोह ज्वाला नित,
मन में मंसूबे पूर्ण कर।
जनम जनम की भटकन,
नीरस माया अंधा बनकर।
बन सगा जो हितकर,
ठग जाये अपना बन कर।
अनादि अनादि से उलझे धागे,
कोई न गया सुलझा कर।
यहीं पाया यहीं पर खोया
अच्छी बुरी पहचान बनाकर।
बंद मुट्ठी प्रकट जमीं पर
चला सूनें हाथ पूंजी बनाकर।
सृष्टि रचना पालक करें,
पूर्ण सभी अभिनय निभाकर।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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