जब भी उन वादियों से गुजरूं याद तुम्हारी आती है,
टूटीफूटी पगडंडियां एहसास तुम्हारा करा जाती है।
ऊंचे ऊंचे पेड़ों की छांव मन को सुकून देती थी,
ठंडी ठंडी हवा पसीने की बूंदों को सुखा देती थी।
कभी उछलती, कूदती आंखों से ओझल हो जाती थी,
तुम्हारे चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती थी।
फिर जोर की आवाज ,डांट मुझे लगाती थी,
बड़ी जिद्दी बार-बार वही गलती दोहराती थी।
पकड़ उंगली ,पीछे पीछे घर चली आती थी ।
वर्ष बीते बचपन बीता पेड़ों के झुरमुट भी वहीं हैं
शीतल समीर बहते झरनों की ध्वनी भी वही है ।
लगता कोई पीछे से अब भी पुकार रहा है,
नटखट बचपन को कोई अब भी
डांट रहा है ।
मुड़कर देखूं कोई नहीं बस इक गूंज लौट रही थी,
ये मन का वहम था मां अपने सच्चे घर चली गई थी।
शी़ला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏
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