जैसा कि विषय है, के करोना काल में इस विषम परिस्थितियों में भारत में क्या-क्या कार्य किए तथा बच्चे जो विद्यालय नहीं जा रहे हैं ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं उनकी शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ा, उन बच्चों की मानसिक स्थितियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा जो अपने दोस्तों से नहीं मिल पा रहे हैं ,खेलकूद में शामिल नहीं हो रहे हैं वो बच्चे कैसा महसूस कर रहे हैं । इस विषय पर मैं अपनी राय प्रस्तुत करती हूं--
कोरोना जिसने वैश्विक महामारी का रूप ले रखा है , महत्वपूर्ण या यूं कहें की अनोखी सीख दे गई । कोविड-19 के दौरान जब सरकार की ओर से लॉकडाउन के आदेश हुए सभी अपने अपने घरों में रहे ,क्योंकि तेजी से फैलती बीमारी से सामाजिक दूरी ही कुछ हद तक कम कर सकती है ।दफ्तर ,स्कूल , कामकाजी स्थान सभी बंद हो गए ।बाजार में खाद्य वस्तुओं के अलावा सब कुछ बंद ।लॉकडाउन में सीमित समय के लिए ढील दी जाती रही। परिवार के सभी सदस्य जो दूर दूर कार्यरत थे ,अपने घर लौट आए, एक छत के नीचे जिंदगी बसर होती रही। घर का कामकाज मिलाजुला रहा। दिनभर की सही रूपरेखा तैयार की गई । योग , व्यायाम , संगीत , पौधारोपण व उनकी देखभाल , घर की साफ सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया ।कोरोना को दूर भगाने तथा रोग प्रतिरोधक ऊर्जा को बनाए रखने के प्रयास किए गए । एक संपन्न परिवार जो जीवन यापन में पूर्ण सामर्थ्यवान है ,उसे करोना काल में इतनी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा होगा , जितनी दिहाड़ीदार मजदूर, फैक्ट्रियों ,होटलों, कारखानों में काम करने वाले कामगारों को । जब नौकरी छिन जाती है तो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित होना पड़ता है । कोविड-19 के दुष्परिणाम इसी वर्ग को ज्यादा भुगतने पड़े। यह महामारी एक और अमूल्य सीख दे रही है कि मुश्किल समय के लिए बचत बहुत जरूरी है । संकट की इस घड़ी में हमने परोपकार की भावना को भी सीखा ।दूसरों का दुख बांटने/ दूर करने का प्रयास भी किया ।करोना काल में व्यक्ति ईश्वरीय शक्तियों पर भी विश्वास करने लगा , उसके मन में आध्यात्मिक भाव जागृत होने लगे । लोभ, माेह ,अहंकार और दंभ सब झूठे लगने लगे, पैसा गौण हो गया ,स्वास्थ्य मुख्य हो गया ।जीवन में अनोखा परिवर्तन आ गया। आज आदमी आदमी से डरता है ना जाने किस में यह करोना नाम की बला विद्यमान है । सबसे ज्यादा बच्चों की पढ़ाई/मानसिकता प्रभावित हुई।
आनलाइन शिक्षा दी जाने लगी। बहुत से माता-पिता बच्चों की पढ़ाई में इस तरह की परेशानी से जूझ रही है। एक सर्वे के मुताबिक हर पांच में से दो माता पिता के पास बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज के सेटअप के लिए जरूरी सामान भी नहीं है । उनके पास कंप्यूटर , टेबलेट, महंगे फोन, प्रिंटर जैसी चीजें नहीं है । आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ऑनलाइन पढ़ाई में कहीं पीछे छूटते दिख रहे हैं। कई ग्रामीण, दूरदराज इलाकों में इंटरनेट की समस्या होती है जो ऑनलाइन पढ़ाई में बाधा बनती है । अतः ऑनलाइन पढ़ाई में चुनौतियां बहुत है। आज सभी इन समस्याओं से भलीभांति परिचित है। बच्चे अपने घरों में सीमित होकर रह गए हैं ,खेलकूद छूट गया है, दोस्तों के साथ मस्ती, घूमना फिरना, पार्टी करना सब कुछ खत्म है । बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं। आने वाले समय में यदि करोना साथ-साथ चला तो इसी के साथ जीवन दिनचर्या बनाने का प्रयास करना पड़ेगा। इसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। बच्चों के मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक क्षमता पर इसका प्रभाव पढ़ रहा है । माता-पिता व परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे किस प्रकार बच्चों का मनोबल बनाए रखने में सफल होते हैं।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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