Wednesday, January 6, 2021

अंतरराष्ट्रीय प्रवासी दिवस पर कविता

 

         समय का चक्र

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बदलता परिवेश छूटता सहारा

समय का चक्र,  भाग्य का मारा

सड़कों पर रोता मजदूर बेचारा

पैदल चल -चल  प्राण भी  हारा।



बच्चे रहे  बिलखते  भूखे प्यासे

बेबस नयनन थे कातर रूआंसे

कड़कती धूप और नंगे पांवो से

प्राण भी छूटे ममता की छाँव से।



खाने  को अन्न  न  जेब में  पैसा ठूंठे हाथ कर्म बिन वक्त ये कैसा 

चारों  दिशाओं  में  पसरा अंधेरा

सपने टूटे तन बना काठमूर्त जैसा




पेट काट-काट, टका-टका संजोया

मेहनत कर बरसों कासपना खोया

तिल-2 तिनका घरौंदा था  बनाया 

आखिरी सांस में भीकाम न आया



 नियति  ने  ये कैसा  खेल रचाया

स्नेह न जाने कहाँ जाकर भगाया 

सन्देह हर मन भीतर अब समाया 

वैश्विकमहामारी ने हरइक रूलाया ।

शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

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