समय का चक्र
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बदलता परिवेश छूटता सहारा
समय का चक्र, भाग्य का मारा
सड़कों पर रोता मजदूर बेचारा
पैदल चल -चल प्राण भी हारा।
बच्चे रहे बिलखते भूखे प्यासे
बेबस नयनन थे कातर रूआंसे
कड़कती धूप और नंगे पांवो से
प्राण भी छूटे ममता की छाँव से।
खाने को अन्न न जेब में पैसा ठूंठे हाथ कर्म बिन वक्त ये कैसा
चारों दिशाओं में पसरा अंधेरा
सपने टूटे तन बना काठमूर्त जैसा
पेट काट-काट, टका-टका संजोया
मेहनत कर बरसों कासपना खोया
तिल-2 तिनका घरौंदा था बनाया
आखिरी सांस में भीकाम न आया
नियति ने ये कैसा खेल रचाया
स्नेह न जाने कहाँ जाकर भगाया
सन्देह हर मन भीतर अब समाया
वैश्विकमहामारी ने हरइक रूलाया ।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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