अभि तो जीवन में भोर हुआ
जरा मुझे संभलने दो
सफलता डगर आसान नहीं
जाँच परख पग धरने दो
पुष्पदल अकर्मण्य न बना दें
काँटों की राह मुझे चलने दो।
मन में जो सपनें पाले हैं मैंने
साकार उनको करने दो
नभ शीर्ष स्पर्श तमन्ना के
पंखों में जान तो भरने दो
उड़ने दो उन्मुक्त गगन में
काँटों की राह मुझे चलने दो।
न डर हो आँधी तूफानों से
विपरीत दिशा से भिड़ने दो
झूझ जाऊं कठिन झोंकों से
हवा का रूख बदलने दो
मंजिल मिले ही तब जाकर
काँटों की राह मुझे चलने दो।
रुढ़ि परिपाटी को तोड़ पाऊं
मन हिम्मत मशाल जलने दो
सदियों से बंधी पाँव बेड़ियां
उन जंजीरों को तोड़ने दो
मुकद्दर लिखूं निज हाथ से
काँटों की राह मुझे चलने दो।
प्रेरणा बने आने वाले कल की
ऐसा उद्धरण करने दो
इतिहास साक्षी बन जाए
ऐसा जीवनचरित रचने दो
यश सुगन्ध फैले चहुं ओर
काँटों की राह मुझे चलने दो।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏
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