Tuesday, December 15, 2020

बिलखता बचपन


              

जब  भी  उस चौराहे  से 

 मैं गुजर  कर  जाती  हूं,

उस  मासूम  बचपन  को

नन्हे हाथ फैलाए पाती हूं।



 भीड़ निकलती लोगों की 

अपनी मस्ती में चलती है,

 कातर स्वर भीख मांगना

 ध्यान सभी का खलती है।



सबके हाथ पर ध्यान बांधे 

दीनता आँख छलकती है, 

भोली  जीविका  हर दिन

लाचारी  में  भटकती  है।



धूल  में  रुलता  शिशु पन 

क्यों डालीफूल विखरता है 

कब हों उद्धार विपन्न का 

मन  में  प्रश्न  उठता है ।


जन बदले हों  ,चाहे  काल 

श्रीहीन निरत ,दीनता  बढ़े

चाहे  बदले , लाख  बयार 

,क्रूर  समाज की बलि चढ़े।



कब ऊसर मानसिकता में 

नव  अंकुर  फूट  पायेंगे ,

उपवन में तब फूल खिलेंगे 

जब जड़  से सींचे जायेंगे।



देश  के मांझी, ये कर्णधार 

और भविष्य ये कहलाते हैं 

कोई गले लगा लो इन्हें भी 

सदियों से ठुकराये जाते हैं।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

सादगी



जीवन में सादगी का नहीं कोई मोल,

न कोई तराजू और न होता कोई तोल। 



विचारों में बड़प्पन ज्यों नभ समान,

लक्ष्य, संकल्प संतोष धन ही सम्मान।



कार्य प्रवीणता और परोपकार की भावना,

सकारात्मक सोच और कल्याण की भावना।



संग्रह /संचय से दूर, खुशियों का जोड़,

न बैर न क्रोध ,न ही ईर्ष्या की है

दौड़।



सादगी ,सच  सहज ,ईश्वर का रूप है ।

सादगी से ही सौंदर्य, सुख का प्रारूप है। 



सादगी से हर उपलब्धि और मान है,

सफल, सार्थक जीवन की पहचान है।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

घरौंदा


           


ईंट गारे का मिश्रण नहीं ये घरौंदा 

भावनाओं  का  मसाला  लगा है ,

पाई पाई का हिसाब देता ये घरौंदा 

पसीने की खारी बूंदों से सजा है ।


कोने कोने में चमक मेहनत की 

हर  उपवन का पुष्प खिला  है ,

प्यार दुलार आदर का है संगम 

रिश्तों को  सलीके से सिला है ।


प्रेम  प्रतीति का बंधन दिलों  में 

कोई शिकवा न  कोई गिला  है ,

स्वर्ग कहाँ?कोई नहीं है जानता,

धरती  पर  ही  स्वर्ग मिला है ।


कुटुंब माला हीरे मोतियों है गूंधी

हृदय मेंशुद्ध प्रेम ज्योति जगती है,

बड़ों की सीख नित राह दिखाती 

बुजर्गों  की आशीश  फलती  है ।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

गीत

 

         

आएंगे प्रभु जग के पालनहार करेंगे सबका उद्धार।

जग रचिया, बंसी बजैया, तुम्हीं मेरे करतार।

आएंगे  प्रभु ............... 


हर युग में लेंगे मेरे प्रभु अवतार 

निज दास को भवसागर से पार दुःख दूर भगाने, गले लगाने को, 

आएंगे प्रभु जग के पालनहार' 

करेंगे सबका उद्धार।

आंएगे प्रभु ............. 


 भोग रस में डूबा सारा संसार

तुम ही पतवार तुम ही खेवनहार 

मीरा की लाज बचाने को 

जहर को अमृत बनाने को

आंएगे प्रभु जग के पालनहार

करेंगे सबका उद्धार ।

आंएगे प्रभु .......... 


 मोह माया जग है मिथ्य निस्सार 

तू  सहारा तू  जीवन का  आधार

 ब्रज में रास रचाने को,

 प्रभु खुशियां बरसाने को,

आएंगे प्रभु जग के पालनहार 

 करेंगे सबका उद्धार ।

आएंगे प्रभु............


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

         

आएंगे प्रभु जग के पालनहार करेंगे सबका उद्धार।

जग रचिया, बंसी बजैया, तुम्हीं मेरे करतार।

आएंगे  प्रभु ............... 


हर युग में लेंगे मेरे प्रभु अवतार 

निज दास को भवसागर से पार दुःख दूर भगाने, गले लगाने को, 

आएंगे प्रभु जग के पालनहार' 

करेंगे सबका उद्धार।

आंएगे प्रभु ............. 


 भोग रस में डूबा सारा संसार

तुम ही पतवार तुम ही खेवनहार 

मीरा की लाज बचाने को 

जहर को अमृत बनाने को

आंएगे प्रभु जग के पालनहार

करेंगे सबका उद्धार ।

आंएगे प्रभु .......... 


 मोह माया जग है मिथ्य निस्सार 

तू  सहारा तू  जीवन का  आधार

 ब्रज में रास रचाने को,

 प्रभु खुशियां बरसाने को,

आएंगे प्रभु जग के पालनहार 

 करेंगे सबका उद्धार ।

आएंगे प्रभु............


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मानवाधिकार दिवस पर कविता



             

               

असमानता का भाव हर युग की निशानी है,

हर एक की जुबानी और हर एक कहानी है।


माना सब एक समान तो यह भेदभाव कैसा,

समान अधिकार पाये हर तो ये विरोध कैसा? 


सड़क किनारे फटे हाल पड़ा ये शख्स कैसा ,

पिचका है पेट बिन हवा की पोटली जैसा।


हर चौराहे पर दिख रहा भीख का कटोरा,

रोटी के टुकड़े पर हक जताता कुत्ता आवारा।


कूड़ा बीनता वह भोला मासूम सा बचपन,

दिल में रहम न किसी की आंखों में शर्म।


गरीब की थाली ,रह गई केवल खाली,

पोषण का अधिकार बातें कागज वाली ।


गली मोहल्ले अबला की आबरू लुटती रही,

रक्षा का अधिकार, पर प्राणों पर खेलती रही।


न्याय का अधिकार, तो कर गया है बेरुखी,

बरसों बरसों की तड़पन रोता है जन दुखी।


मन के उदगार बंद कपाट न खुले हैं कभी,

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सलाखों में सभी ।


हर अधिकार का हनन आज हो रहा है, 

मानवीय मूल्यों का मजाक खूब हो रहा है।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

स्वर्ग से सुंदर मेरा भारत

 कविता 

        

       

 डाली डाली पुष्प खिला है 

ये उपवन कितना सुन्दर है, 

मेरा प्यारा ये भारत देश 

'स्वर्ग से सुंदर' है,स्वर्ग से सुंदर है। 


भिन्न संस्कृति के दर्शन होते यहां

मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा यहां

अनेक जाति धर्म बसते लोग यहां

राष्ट्रीय एकता अखंडता है जहां। 


डाली डाली पुष्प खिला है 

ये उपवन कितना सुन्दर है 

मेरा प्यारा ये भारत देश 

स्वर्ग से सुंदर है,स्वर्ग से सुंदर है। 


नदियां इस देश का गौरव सदा 

मां कह पुकारी, पूजी जाती यहां

श्रद्धाभक्ति की डुबकी लगती यहां

मनोरथ सिद्धी पाये हर जन  यहां 


डाली डाली पुष्प खिला है 

ये उपवन कितना सुन्दर है 

मेरा प्यारा ये भारत देश 

स्वर्ग से सुंदर है ,स्वर्ग से सुंदर है। 


हिमाच्छादित ऊंचे शैल शोभित यहां 

प्रकृति सुन्दर छटा विखेरती जहां

घने जंगल  बहु वन  संपदा  यहां

खेत हरियाली  मन  मोहती सदा 

डाली डाली पुष्प खिला है 

ये उपवन कितना सुन्दर है 

मेरा प्यारा ये भारत देश 

स्वर्ग से सुंदर है, स्वर्ग से सुंदर है। 


अपनी भाषा अपनी बोली यहां 

हर शब्द में मिश्री घोली हो जहां

परम्परायें, रिवाज अति सुखकर 

इक दूजे संग घुल मिल जाते जहां 

डाली डाली पुष्प खिला है 

ये उपवन कितना सुन्दर है 

मेरा प्यारा ये भारत देश 

स्वर्ग से सुंदर है ,स्वर्ग से सुंदर है ।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

मानवीय मूल्यों का हास

 

   


पनप रहा पाप ,कांप रही  धरती

फैल रहे  कंक्रीट ,छलनी  प्रकृति

ज्ञान के चिराग, गुम गए अंधेरों में

नकली आवरण छूट रही संस्कृति।


एकाकी जीवन मोहपास बांध रहा

संयुक्त परिवार का विघटन हो रहा

आत्म  केंद्रित  हो  गया  है  मानव

मजबूरी में रिश्तो का बोझ ढो रहा         


हो रहा  मर्यादाओं का आज पतन

संचित जीवनमूल्य बेकार हर यत्न         

श्रद्धा होकर बेबस घुटने  टेक  रही

जीवन रहस्य सब गर्त में है दफन।


स्वार्थी संतति आडंबरता झेल रही

घर मर्यादा दंभ के शोले  खेल रही

संजोया जिस प्रतिष्ठा को बुजुर्गों ने

टुकड़ों टुकड़ों में आज वो बंट रही। 


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

कर्म योगी किसान

 


धरती मां का साधक किसान है

कर्मठता उसकी साधना विधान है


भोर अप्रकटे खेतों में पहुंच जाता 

रवि रश्मि सर्वपूर्व कार्य लग जाता


मनचौकन्ना तन बेसुधि लक्ष्य पाने 

रैनदिवस इकसार हो कृषकी जाने


ऋतु सदृश हर अन्न उगाया उसने 

धूप बर्षा गर्मी  सहन किया उसने


हर दर्द सहा हर पीड़ा ले ली उसने 

सूखा बाढ़ सब विपदा झेली उसने


कर्ज चढ़ा सिर घाटा फसल पाया 

वर्षों वर्ष बीते फिर उभर न पाया


 हाथ जोड़ अर्ज कर व्यथा सुनाता

करे पुकार सड़कों पर आ उतरता 


 क्यों इतना अन्याय मुझसे हो रहा 

 कर्मयोगी बन कर भी क्यों रो रहा


क्याअन्नदाता का अपमान नहीं है

क्या इसका कोई समाधान नहीं है


उसका सम्मान बना रखना होगा 

धरती साधक है मान रखना होगा।


जय जवान जय किसान


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

ज़िन्दगी


  

उलझाओ तो उलझ जातीज़िन्दगी

सुलझाओ तो सुलझ जातीजिंदगी


 मन के भावों से बंधा है हर कोना

 बदलो तो बदल भी जाती जिंदगी


 कांटों की सेज मुश्किल  है सोना

 संवारो तो संवर भी जाती जिंदगी


मन की तड़पन में हृदय  का रोना

खुशी केआंसूभी बनजाती जिंदगी   


खिलते फूल महक जीवन में होना

'शील' का श्रृंगार बन जाती जिंदगी।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

Monday, December 7, 2020

बाल कविता

 

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मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी

ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी


घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी

अच्छा वस्त्रभोजन जिद्द न करूंगी


 मिट्टी गारा इन हाथों से हटा दो मां

कॉपी पेंसिल इनमें तो थमा  दो मां


 मुन्ना मुन्नी संग मैं रोज खेलती हूं

 पढ़ने की इच्छा मन में पालती हूं


कखग एबीसी अक्षर ज्ञान पाऊं मैं

पढ़ना लिखना एक उदेश्य चाहूं मैं



 जो बच्चे अच्छे पढ़ लिख जाते हैं 

 मेहनत के बल कुछ कर पाते  हैं।


 जग इतिहास में भी जाने जाते हैं

 अपने देश का गौरव वो बढ़ाते हैं।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

सशस्त्र सेना झंडा दिवस


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यह दिवस उन शहीदों को समर्पित

हंसते-हंसते  जान कर गये अर्पित 


झंडा सम्मान सैनिकों का  दर्शाता

 स्वाभिमान  सैनिकों  का  समाता 


 एकजुटता का  प्रतीक है ये  झंडा

 राष्ट्र अखंडता का चिह्न है येझंडा 

 

 सीमा  पर  इसको  फहराया  गया

 उग्रवाद आतंकवाद मिटाया  गया


शत्रु के कु चक्कर को ये तोड़ता है

 निराश टूटे जन मन को जोड़ता है


जांवाज सैनिक की कहानी सुनाए

 हर एक में राष्ट्रभक्ति  प्रेम  जगाए 


आओ सब मिल ये दिवस  मनाएं

 झंडे का  रखें  मान,शान  बढ़ाएं।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

विश्व मृदा दिवस

 

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       कविता

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 मैं मृदा पालक सबकी निराली 

हूं बन्दनीय ,बांटती खुशहाली 

 कहीं मैं चिकनी हूं कहीं रेतीली 

कहीं सख्त और कहीं हूं काली।



 जननी हूं जग बाटिका माली

 युग युगांतर से ये सृष्टि  पाली

 ऊंचे ऊंचे टीले पर्वत हरियाली श्रृंगार करता हर पत्ता हर डाली।


हृदय पर  बीज  होते  प्रस्फुटित

अंकुर होता पौध पेड़ों परिवर्तित

झड़ते पीले पर्ण मिल जाते झट 

खेती योग्य बन फिर से उर्वरक ।


 मेरी खुशबू से बचपन खिला है

बन खिलौनाआनंद बहुत मिला है

नन्हे हाथों से चिपक चिपक कर

 प्यार वोअनूठा मुझे भी मिला है।


कुम्हार के चाक पर सौंधी गई हूं 

 छोटे बड़े बर्तन बनकर सजी हूं

 दिवाली के लिए दीप मैं बनी हूं

रंग बिरंगे आकार पाकर तनी हूं। 


 मैंने पुरखों के घर को सजाया है

घर आंगन  का  सौंदर्य बढ़ाया है

 मेरी खुशबू पर सब थे निछावर 

 खेत खलिहानों  को सगाया है।



मेरा आंचल हर जीव का पालना 

मेरी गोद में हर  पांव का  चलना

नन्हे शिशु  का  गिरना  संभलना

जग में हर इक को मेरा थामना ।


 मैं मृदा माटी रजरेणु मृतिका हूं 

नाम चाहे अनेक एक मातृका हूं

करना संरक्षण ज्यों मैं करती हूं

भविष्य की सुखउम्मीदें भरती हूं।



शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

मां गंगा


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हिंदू धर्म में देवी रूप है गंगा 

धर्म जाति देश श्रृंगार है गंगा 

हरजन मुक्ति का द्वार है गंगा

संस्कृति का संस्कार  है गंगा।


पावन नीर, सबका उद्धार करे 

बंजर धरा में ये हरियाली भरे 

खेत खलिहान शस्य,धान्य भरे 

उपवन उपवन पुष्प हररंग भरे।


जननी जग निर्मल करती आई 

पोषित कर देवी रूप कहलाई 

आनादि अविरल धारा बहाई 

सभ्यता संस्कृति प्रतीक कहाई। 


पर क्यों इस मानव में समझ नहीं 

दूषित शुचि नीर अब दूषित मही 

उद्गम था वृहत क्यों सिकुड़ चली 

संवारे जन जीवन जो मुड़ चली। 


हिन्द बांधव प्रण एक है निभाना

रिसती सत्ता को होगा ही बचाना

बहती रहे सदा शुद्ध धारा निरत 

मन मन में भाव अवश्य जगाना ।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

वेदना

 

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 वेदना तू कितनी निष्ठुर है

 तरस  भी  नहीं खाती  है।


 दूर जितना करूं स्वंय से

 उतनी  पास तू आती  है।


 साथ साथ चलती फिरती

 गाती और गुनगुनाती हैं ।


 रात दिवस बनकर सहेली

 समय संग खूब बिताती है।


कभी तो बढ़ाती पीड़ा तीव्र

कभी मरहम भी लगाती है।



मैं पूछूं क्या तेरा बिगाड़ा ?

जो घाव पर घाव लगाती है।


कभी आंहो  में घिर जाती

बरबस ही मुझे रुलाती है।


जब जब खुशियां हैं मिलती

पीछे-पीछे  दौड़ी आती  है।


 हृदय के गहरे में छुप जाती 

चक्षु-अश्रु तू  बन  जाती  है।



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

ग्रेट इन्डियन हार्नविल

 👆 (बूझो ये पक्षी का नाम क्या है और यह किस राज्य की शोभा है)


 देखो मैं पक्षी नहीं साधारण

 छोटे से राज्य की शोभा हूं।


हर जन करता मुझसे प्यार

भिन्न भिन्न रंग युक्त आभा हूं।


लम्बी भारी चोंच से शोभित 

फल झटके से खा लेता हूं। 


मेरे पंखों की शोभा न्यारी 

ऊंची उड़ान भर लेता हूं। 


मेरे नाम पर मेले हैं लगते 

दस दिवस उत्सव मनाते हैं। 


दूर दूर से लोग आते मिलजुल

नृत्य और गायन खूब रचाते हैं।


मैं खुद को मानूं धन्य,भाग्यशाली

सब अपनापन मुझमें दर्शाते हैं ।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर नमन

 


सादगी प्रवीणता से भरा जीवन जिनका था ,

मन उच्च महान विचारों का जो   खजाना था ।


बिहार के सिवान में जिनका जन्म हुआ था

मां कमलेश्वरी पिता महादेव सहाय नाम था। 


3दिसम्बर. वह अति पावन दिवस था 

मेरे देश में महान विद्वान प्रकट हुआ था  


छपरा पटना से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की, 

कलकता से कानून में मास्टर डिग्री ली।


गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से था जीवन प्रभावित,

आत्मकथा में हर एक घटना है लिखित।



 पांच भाषाओं में ज्ञान अच्छी पकड़ थी ,

हिंदी अंग्रेजी उर्दू फारसी और बांग्ला भी। 


दासता नहीं स्वीकार आजादी की अलख जगाई,

भारत 'छोड़ो आंदोलन' 'नमक सत्याग्रह जेल पाई।



प्रयास हुए सफल भारत स्वतंत्र हुआ,

देश के लाल के मन का सपना साकार हुआ।


गांधी के करीबी बने देश का उद्धार किया,

संविधान सभा का भी तो नेतृत्व किया ।



प्रथम राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त किया,

दीर्घावधि अपनी योग्यता का परिचय दिया।


राष्ट्रहितैषी देश का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त किया,

भारत रत्न से जिन्हे सम्मानित किया। 



जिनके जीवन को आदर्श देश का युवा मानता है,

 उनकी जयंती पर हर भारतवासी नमन करता है।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

हूं तन से दिव्यांग मन से नहीं

 

     

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पक्के इरादों की उड़ान मैं भरती हूं  

कंटीले रास्तों पर सदा मैं चलती हूं

चलफिर न सकूं पर अक्षम नहीं हूं

हूं तन से दिव्यांग पर मनसे नहीं हूं



मैं पवन वेग, रजकण संग चली हूं 

कांति पाने धूल मिट्टी सभी सनी हूं 

आँधी तूफानों से मैं लड़ती  रही हूं 

हूं तन से दिव्यांग पर मनसे नहीं हूं 


बन नदी धारा चट्टानों से टकराई हूं

निज मार्ग में गति ही मोड़ लाई  हूं

लघु दीर्घ पड़ाव रुक ठहर पली  हूं 

हूं तन से दिव्यांग पर मनसे नहीं हूं


धरा से शील चंन्द्र शीतलता पाई हूं

नक्षत्रों  से जीवन में कांति लाई  हूं 

श्रम, ज्ञान सफलता संतुष्टि पाई हूं 

हूं तन से दिव्यांग पर मनसे नहीं हूं


विधि -मानव के मध्य की कड़ी  हूं   

वक्त को चुनौती मैं अमोल घड़ी हूं

हैं पाँव नहीं पर मैं पाँव पर खड़ी हूं

हूं तन से दिव्यांग पर मनसे नहीं हूं



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

प्रेम में ही परमात्मा को पाने की असीम शक्ति होती है

 यद्यपि ज्ञान किसी भी व्यक्ति की तीसरी आंख माना गया है ।ज्ञान के माध्यम से वह अनेक विशेष जानकारियां ग्रहण कर लेता है किताबों का अध्ययन कर लेता है । भक्ति भाव, विधान,  पूजा ,अर्चना के नियम ,सिद्धांत  जानकारी अवश्य ग्रहण कर लेता है ।इस सब के पीछे उसका प्रयोजन कुछ अलग भी हो सकता है ।ज्ञानवान व्यक्ति  के हृदय में यदि प्रभु के प्रति  प्रेम भाव है  तो उसमें अंहभाव अवश्य होगा ।ज्ञान  कई बार व्यक्ति के मन में घमंड की उत्पत्ति कर देता है । ऐसे में प्रभु को कैसे पाया जा सकता है ?लेकिन प्रभु तक पहुंचने के लिए प्रभु के प्रति 'प्रेम'ही भक्ति का सबसे सुगम मार्ग माना गया है। ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे उत्तम और सरल उपाय प्रेम हो सकता है। क्योंकि प्रेम ईश्वर के प्रति आसक्ति /भक्ति का प्राण है। प्रेम में ही परमात्मा को प्राप्त करने की असीम शक्ति होती है। ज्ञानी व्यक्ति में यदि प्रेम का अभाव है तो उसकी सारी योग्यताएं प्रभावहीन रहती हैं।  प्रेम का महत्व महापुरुषों ,सिद्ध ज्ञानियों  ने समझा। अपने समय के प्रसिद्ध समाज सुधारक संत कबीर ने भी ढाई अक्षर प्रेम को ही ज्ञान की  पराकाष्ठा माना है।  बिना प्रेम शास्त्र ज्ञान भी बोझ लगता है । ईश्वर भक्ति में प्रेम के सफल उदाहरण हमारे इतिहास में भरे पड़े हैं-'  शबरी का राम के प्रति प्रेम, शबरी के प्रेम में वशीभूत होकर श्रीराम उनके झूठे फलाहार को भी ग्रहण कर गए। श्री राम ने शबरी के फलाहार के रस को सूरस से यानी उपरति की संज्ञा दी ।अर्थात सुरस से बड़ा कोई रस नहीं है ।मीरा का कृष्ण  के प्रति अथाह प्रेम, मीरा हर समय भगवान कृष्ण की प्रेम भक्ति में लीन रहती थी ,यह बात राणा को अच्छी नहीं लगी उन्होंने मीरा को  पीने के लिए जहर का प्याला दिया । मीरा उसे पी गई लेकिन प्रभु की कृपा से  मीरा को कुछ नहीं हुआ ।गोप, गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम , निनाद का प्रेम, जगत में वनस्पतियों ने भी प्रेम से ही ईश्वर को प्राप्त किया । अतः प्रभु को पाने के लिए ज्ञान ,भक्ति और वैराग्य में प्रेम पूर्ण भक्ति सबसे सुगम मार्ग है । जिसमें सबसे जरूरी है ' मन की निर्मलता ' मन निर्मल होगा वही भक्त ईश्वर को समझ पाएगा । कबीर दास का एक दोहा इसी भाव को लिए हुए हैं-- कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर, पीछे पीछे हरि फिरें कहे कबीर कबीर। प्रेम सर्वोपरि है ।क्योंकि प्रेम हृदय से देखता है । बुद्धि की आंखों से सर्वोत्तम  प्रेम की आंखें हैं ।ईश्वर के प्रति प्रेम भक्ति भावना मनुष्य के मन को असीम शांति प्रदान करती है।

 धन्यवाद ।

 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

बाल कविता


         

         'तितली'

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 रंग बिरंगे -पंखों वाली

 प्यारी-2 आंखों  वाली।


 सुंदर तितली उड़ती जाए 

 मन को मेरे बड़ी सुहाय।


 कभी फूल पर ये इतराती 

 कभी पतियों में छुप जाती।


कभी झुंड  में  उड़ती  जाती

तो कभी अकेली आती जाती।


बच्चे इसके पीछे पीछे भागे

हाथ पकड़कर लंबे लंबे धागे।


 कोशिश करते  बांध न पाते

 खुश होते और ताली बजाते।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

गजल


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रात भर जागी वो शम्मा साथ थी पिय की याद में रोई वो आंख थी


धीरे से कानों में सुनी आवाज थी

पर वो तो हवायें श्रृंगारी साज थी


 तारों सजी महफिल आबाद थी खामोशी का आलम या लाज थी


शव-ए-ग़म दर्द मिला पर नाज़ थी 

अश्कडूबी आंखें वो लाजवाब थी 


हिम्मत निराशमन की वो आस थी

शमा'शील' के लिए कुछ पल खास थी।

 

शीला सिंह

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...