Tuesday, December 15, 2020

मानवाधिकार दिवस पर कविता



             

               

असमानता का भाव हर युग की निशानी है,

हर एक की जुबानी और हर एक कहानी है।


माना सब एक समान तो यह भेदभाव कैसा,

समान अधिकार पाये हर तो ये विरोध कैसा? 


सड़क किनारे फटे हाल पड़ा ये शख्स कैसा ,

पिचका है पेट बिन हवा की पोटली जैसा।


हर चौराहे पर दिख रहा भीख का कटोरा,

रोटी के टुकड़े पर हक जताता कुत्ता आवारा।


कूड़ा बीनता वह भोला मासूम सा बचपन,

दिल में रहम न किसी की आंखों में शर्म।


गरीब की थाली ,रह गई केवल खाली,

पोषण का अधिकार बातें कागज वाली ।


गली मोहल्ले अबला की आबरू लुटती रही,

रक्षा का अधिकार, पर प्राणों पर खेलती रही।


न्याय का अधिकार, तो कर गया है बेरुखी,

बरसों बरसों की तड़पन रोता है जन दुखी।


मन के उदगार बंद कपाट न खुले हैं कभी,

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सलाखों में सभी ।


हर अधिकार का हनन आज हो रहा है, 

मानवीय मूल्यों का मजाक खूब हो रहा है।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

No comments:

Post a Comment

मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...