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वेदना तू कितनी निष्ठुर है
तरस भी नहीं खाती है।
दूर जितना करूं स्वंय से
उतनी पास तू आती है।
साथ साथ चलती फिरती
गाती और गुनगुनाती हैं ।
रात दिवस बनकर सहेली
समय संग खूब बिताती है।
कभी तो बढ़ाती पीड़ा तीव्र
कभी मरहम भी लगाती है।
मैं पूछूं क्या तेरा बिगाड़ा ?
जो घाव पर घाव लगाती है।
कभी आंहो में घिर जाती
बरबस ही मुझे रुलाती है।
जब जब खुशियां हैं मिलती
पीछे-पीछे दौड़ी आती है।
हृदय के गहरे में छुप जाती
चक्षु-अश्रु तू बन जाती है।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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