Monday, December 7, 2020

वेदना

 

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 वेदना तू कितनी निष्ठुर है

 तरस  भी  नहीं खाती  है।


 दूर जितना करूं स्वंय से

 उतनी  पास तू आती  है।


 साथ साथ चलती फिरती

 गाती और गुनगुनाती हैं ।


 रात दिवस बनकर सहेली

 समय संग खूब बिताती है।


कभी तो बढ़ाती पीड़ा तीव्र

कभी मरहम भी लगाती है।



मैं पूछूं क्या तेरा बिगाड़ा ?

जो घाव पर घाव लगाती है।


कभी आंहो  में घिर जाती

बरबस ही मुझे रुलाती है।


जब जब खुशियां हैं मिलती

पीछे-पीछे  दौड़ी आती  है।


 हृदय के गहरे में छुप जाती 

चक्षु-अश्रु तू  बन  जाती  है।



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

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