Monday, December 7, 2020

विश्व मृदा दिवस

 

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       कविता

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 मैं मृदा पालक सबकी निराली 

हूं बन्दनीय ,बांटती खुशहाली 

 कहीं मैं चिकनी हूं कहीं रेतीली 

कहीं सख्त और कहीं हूं काली।



 जननी हूं जग बाटिका माली

 युग युगांतर से ये सृष्टि  पाली

 ऊंचे ऊंचे टीले पर्वत हरियाली श्रृंगार करता हर पत्ता हर डाली।


हृदय पर  बीज  होते  प्रस्फुटित

अंकुर होता पौध पेड़ों परिवर्तित

झड़ते पीले पर्ण मिल जाते झट 

खेती योग्य बन फिर से उर्वरक ।


 मेरी खुशबू से बचपन खिला है

बन खिलौनाआनंद बहुत मिला है

नन्हे हाथों से चिपक चिपक कर

 प्यार वोअनूठा मुझे भी मिला है।


कुम्हार के चाक पर सौंधी गई हूं 

 छोटे बड़े बर्तन बनकर सजी हूं

 दिवाली के लिए दीप मैं बनी हूं

रंग बिरंगे आकार पाकर तनी हूं। 


 मैंने पुरखों के घर को सजाया है

घर आंगन  का  सौंदर्य बढ़ाया है

 मेरी खुशबू पर सब थे निछावर 

 खेत खलिहानों  को सगाया है।



मेरा आंचल हर जीव का पालना 

मेरी गोद में हर  पांव का  चलना

नन्हे शिशु  का  गिरना  संभलना

जग में हर इक को मेरा थामना ।


 मैं मृदा माटी रजरेणु मृतिका हूं 

नाम चाहे अनेक एक मातृका हूं

करना संरक्षण ज्यों मैं करती हूं

भविष्य की सुखउम्मीदें भरती हूं।



शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

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