पनप रहा पाप ,कांप रही धरती
फैल रहे कंक्रीट ,छलनी प्रकृति
ज्ञान के चिराग, गुम गए अंधेरों में
नकली आवरण छूट रही संस्कृति।
एकाकी जीवन मोहपास बांध रहा
संयुक्त परिवार का विघटन हो रहा
आत्म केंद्रित हो गया है मानव
मजबूरी में रिश्तो का बोझ ढो रहा
हो रहा मर्यादाओं का आज पतन
संचित जीवनमूल्य बेकार हर यत्न
श्रद्धा होकर बेबस घुटने टेक रही
जीवन रहस्य सब गर्त में है दफन।
स्वार्थी संतति आडंबरता झेल रही
घर मर्यादा दंभ के शोले खेल रही
संजोया जिस प्रतिष्ठा को बुजुर्गों ने
टुकड़ों टुकड़ों में आज वो बंट रही।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏
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