Tuesday, December 15, 2020

बिलखता बचपन


              

जब  भी  उस चौराहे  से 

 मैं गुजर  कर  जाती  हूं,

उस  मासूम  बचपन  को

नन्हे हाथ फैलाए पाती हूं।



 भीड़ निकलती लोगों की 

अपनी मस्ती में चलती है,

 कातर स्वर भीख मांगना

 ध्यान सभी का खलती है।



सबके हाथ पर ध्यान बांधे 

दीनता आँख छलकती है, 

भोली  जीविका  हर दिन

लाचारी  में  भटकती  है।



धूल  में  रुलता  शिशु पन 

क्यों डालीफूल विखरता है 

कब हों उद्धार विपन्न का 

मन  में  प्रश्न  उठता है ।


जन बदले हों  ,चाहे  काल 

श्रीहीन निरत ,दीनता  बढ़े

चाहे  बदले , लाख  बयार 

,क्रूर  समाज की बलि चढ़े।



कब ऊसर मानसिकता में 

नव  अंकुर  फूट  पायेंगे ,

उपवन में तब फूल खिलेंगे 

जब जड़  से सींचे जायेंगे।



देश  के मांझी, ये कर्णधार 

और भविष्य ये कहलाते हैं 

कोई गले लगा लो इन्हें भी 

सदियों से ठुकराये जाते हैं।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

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