Wednesday, November 18, 2020

कविता - अबला नहीं मैं सबला हूं

 'अबला नहीं मैं सबलाहूं'

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मैं इतिहास विजय  कहानी  हूं,

नहीं अबला मैं योद्धा मर्दानी हूं।


बीच सभा में तिरस्कारी हूं ,

जुए  में  भी  बेची ,हारी हूं,

वस्त्र खींचे,बाल भी नोचे -

हर  पल  की  मैं  सवाली  हूं।

तलवार हाथ खडग ज्वाली हूं

 क्योंकि ..........

अब मैं दुर्गा चंडी काली हूं।


मैं  इतिहास  विजय कहानी  हूं 

नहीं अबला मैं योद्धा मर्दानी हूं।


मैं वन वन जीवन भटकी हूं

दुराचारी आंख में खटकी हूं,

मानमर्यादा सहेजती रही हूं,

दीर्घ अंर्तपीड़ा भी  झेली हूं,

 सब्र  की अब पराकाष्ठा हूं, 

 तलवार हाथ खडग ज्वाली हूं

 क्योंकि.......

अब मैं दुर्गा चंडी काली हूं।



पूछूं  प्रश्न विधाता  से मैं आज,

क्यों दबी है दुखियारी आवाज,

नारी नहीं भोग्या और न  साज,

जग सुता बिन शोभाहीन ताज,

तलवार हाथ खडग ज्वाली हूं,

 क्योंकि........

मैं  अब  दुर्गा  चंडी  काली  हूं।


मैं  इतिहास  विजय कहानी हूं, 

नहीं अबला मैं योद्धामर्दानी हूं।


अपनों  में  रही  मान एहसानों को

कौन अपना कैसे जानू बेगानों  को

खोटी नियत  दूषित आत्माओं को

संहारू सबक सिखाऊं शैतानों को

तलवार  हाथ  खडग  ज्वाली  हूं।

 क्योंकि.......

मैं  अब  दुर्गा  चंडी  काली  हूं।


मैं इतिहास विजय  कहानी  हूं ,

नहीं अबला मैं योद्धा मर्दानी हूं।


अब बिजली कड़के अंबर फूटे

पहाड़  टूटे या धरती खंड  छूटे

जकड़ी बेड़ियां वो परिपाटी टूटे

विनाशी और अंध जंजीरे खूंटे

बदल भेष बन रक्त पिपासी हूं

तलवार हाथ खडग ज्वाली  हूं

क्योंकि......

 मैं  अब दुर्गा  चंडी  काली  हूं।

मैं  इतिहास विजय  कहानी  हूं ,

नहीं अबला में योद्धा मर्दानी हूं।



शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

05.11.2020🙏

कहानी-=घर-घर में निराश बागवां

 घर-घर में निराश बागवा 

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 पिताजी के कमरे में घोर सन्नाटा, एकदम अंधेरा था-  मैंने जैसे ही घर में प्रवेश किया सीधी नजर पिताजी के कमरे पर पड़ी । कमरे में प्रवेश करते ही मैंने बिजली का स्विच दबाया देखा -सामने पिताजी कुर्सी पर बैठे किसी सोच में डूबे हुए थे । मैंने झट से पूछा- पिताजी क्या बात है ",जब से मां गई है तब से आप गुमसुम ही रहते हैं कुछ अपने स्वास्थ्य का ध्यान भी रखो ।"

 पिताजी जैसे ही चिर निद्रा से उठे हो बेटीे की आवाज सुनकर उसकी तरफ दृष्टि दौड़ाई और कहने लगे-  नहीं बेटी! " मैं ठीक हूं बस कल के सफर की तैयारी के बारे में सोच रहा था।"

 कल के सफर के बारे में ! कैसा सफर  ? बेटी ने बड़ी हैरानी से पूछा ।

'बेटी '  -' यहां दो महीने पूरे हो गए हैं आज ,कल से दूसरे बेटे के पास रहना है।'

 बेटी अपने पिता के प्रति सहानुभूति दिखाती हुई अपने भाइयों को बुरा -भला कहने लगी कि' इनका भी वैसा ही समय आएगा जैसा आज आपका है'

 जायदाद के मालिक भी यही है मैंने तो अपना हिस्सा इन्हें दे दिया है, ताकि मेरा अपने मायके में आना-जाना इज्जत से बना रहे।

 पिताजी बोले-' बेटी ' भगवान 'बेटों 'को इसलिए जन्म देते हैं ताकि वह अपने मां-बाप का सहारा बने । मगर वाेह सब कुछ भूल जाते हैं  ।बेटियां मां-बाप की सबसे बड़ी ' ' ' 'हमदर्द 'होती हैं । उनके दुःख /पीड़ा को  समझतेी  हैं ।

 पिताजी के चेहरे पर थोड़ी देर के लिए -संतोष भाव जागा  और वे तनिक 'मुस्कुराए 'कहने लगे-' बेटी ' अपने मां-बाप के प्रति तुम्हारे ह्रदय में जो हमदर्दी है वह प्रशंसनीय है, मैंने तुम्हें भी बेटों की तरह ही पाला है और अच्छे संस्कार दिए हैं ।

 बेटी थोड़ी देर चुप रहती है फिर कहती है--

 पिताजी-  मैं भी आपकी  देखभाल कर सकती हूं मगर दाे दिन बाद बुड्ढे - बुड्ढी को अपने पास रखने की हमारी बारी है ,मेरे पति और इनके तीनो भाई अपने मां-बाप को तीन-तीन महीने अपने पास रखते हैं , अभी बेटी अपना वाक्य पूरा ही कर रही थी कि पिताजी बड़ी हैरानी से अपनी बेटी की तरफ देखते हैं और कहते हैं !- 'बेटी' तुम लोगों ने भी यही नियम अपनाया है   

  'कहते हैं बेटों की अपेक्षा बेटी बहुत संस्कारी होती है जो बड़ों के प्रति आदर और सेवा भाव रखती है वाे चाहे उसके अपने मां-बाप हो या सास-ससुर' 


 पिताजी को लग रहा था कि आज वह सारी संस्कारी परवरिश 'बालू रेत' की भांति हाथ से फिसलती जा रही थी, जो हवा के एक झोंके से अपनी पहचान तक गंवा देती है ।


 यह सोचते-सोचते पिताजी फिर अपना सामान समेटने लगे अगले कल के सफर की तैयारी के लिए ।


🙏

'गजल'


           

                 गजल

                 --------

न कोई हिन्दू न मुसलमान बुरा है नफरत जो फैलाये इन्सान बुरा है


भावना किसी की नहीं हो आहत

न गीता  बुरी है न  कुरान  बुरा है


हर संदेश लिखा है इंसानियत पर

हर शब्द  पवित्र हर भाव बड़ा है 


भरे हों धन दौलत के भंडार  चाहे

धन तो मैल हाथ का ईमान बड़ा है


ज्ञान का बादशाह न  जग में कोई

हर एक में समाहित हुनर बड़ा है 


रोके न रूके किसी का सफर यहां चाहे राह में जितना रोड़ा अड़ा है।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

-उतराखंड -स्थापना दिवस

 उत्तराखंड  राज्य  के स्थापना दिवस पर  सभी को मेरी ओर से बधाई  व उत्तराखंड धरा को शत शत प्रणाम ।🙏🙏

नौ नवंबर इतिहास में स्वर्णिम दिवस आया है 

उत्तराखंड स्थापना दिवस जो पाया है ।

करें इस धरा को नमन पवित्र धरा को नमन ।

सुंदर मन मोहिनी यह पावन धरती है।

अल्मोड़ा का सौंदर्य नैनादेवी छटा

 निराली है।

 बागेश्वर की महिमा कितनी प्यारी और अपार है।

चूमते आकाश बांस बुरांसअनोखा विस्तार है।

बद्रीनाथ का धाम चमोली को देता   शोभा है। 

गोपेश्वर और हेमकुंड भी सुंदरता बरसाता है।

अद्भुत सौंदर्य से गूंधी फूलों की घाटी है

तप कुंड विष्णुप्रयाग पंच प्रयाग

दिव्य माटी है।


लीची  के  बागों से  सजी  मसूरी रानी है।

देहरादून इसकी गौरवमयी राज                       धानी है।

अंग्रेजों की सत्ता देखो यहां कई निशानी है।

अति पवित्र और पावन तीर्थ  ये    हरिद्वार है।

शिव कीजटा से बहती गंगा की धार है।

पंचेश्वर  देवीधुरा और सिखों का गुरुद्वारा

नागनाथ का  मंदिर  सुंदर बड़ा नजारा है।

झीलों  संग  सजा  हुआ प्यारा नैनीताल है।

चाइना पीक देखो यहां चोटी तो    बेमिसाल है।

सौंदर्य विखेरे अति सुंदर तल्ली मल्ली ताल है।

 पौड़ी जिला  तो उत्तराखंड की जान है।

नागर्जा का मंदिर  जालपा  मां विराजमान है।

बिंसर महादेव तारा कुंड भी तो इसका प्राण है।

उल्कादेवी मंदिर पिथौरागढ़ सीमा       का प्रहरी है।

रायगुफा अनोखी  छटा  भटकोट हनुमानगढ़ी है। 

अलकनंदा मंदाकिनी और संगम रुद्रप्रयाग  है।

अगस्त्यमुनि गुप्तकाशी कालीमठ मद्महेश्वर तुंगनाथ है। 

सुरकंडा चंद्रबदनी कुंजापुरी होती जयकार है।

गब्बर सिंह चंद्र सिंह माधो सिंह वीरों की धरती है।

श्री देव सुमन टिहरी जिला में पीर पलती है। 

चैती मंदिर गिरी सरोवर नानक माता धाम है ।

इतिहास के पन्नों में इस सुंदर धरती का नाम है।

नमन करूं शीश झुकाऊं पावन धरा को आज मैं,

जितना हो वर्णन कम है अनुपम दिव्य धाम ये।।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

गजल - 'जिंदगी'

 -----गजल-----


     'जिंदगी '

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जिंदगी रोज इक इम्तिहान होती है,

कभी खुशी तो कभी गम देती है ।


चाह मन नभ में विचरण  करने को,

उन्मुक्त परिंदों के पर काट देती है।


कभी छीन लेती है चेहरे से लालिमा,

कभी खूबसूरत रंगों से भर देती है ।


कभी काले खयालों में ही छुपा देती है, 

कभी झढ़ी खुशियों की भी लगा देती है ।


डूबा देती है बन आफत मंझधार में,

सहेज कर किनारे भी लगा देती है ।


सजदा करती अश्रु धारा वो     बहाती है,

चुपके से मन आशा से भर जाती है ।


गुम हो जाती घने अंधेरे में कभी,

फिर झटसे उजाला भी भर      जाती है।


जिंदगी भेद अबतक समझ       न पाई,

कभी हंसाई तूने और कभी रुलाई।



 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

'माटी का दिया'

 'माटी का दिया'

  कविता

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मैं माटी का दिया पाऊं रूप अनेक


मानव तू भी माटी का सुन मेरा संदेश।


खाेदा छाना मिट्टी से सुंदर मुरत पाऊं,


गल जाऊं फिर मिट्टी में ही मिल जाऊं।


बाती संग मिल प्रेम दृढ़ता जगाऊं,


बलिहारी जाऊं बिन बाती

जल न पाऊं।


तम त्याग जग मन करूं आलोकित ,


समझे जो प्यार किरण वहीं

बस जाऊं।


मन में भक्ति भाव जगाऊं ज्ञान बताऊं, 


सद्भाव सुसज्जित मंदिर में

शोभा पाऊं ।


जो टूटे कभी फिर ना जुड़ पाऊं,


जीवन अमर प्रेम -कहानी कह जाऊं।


 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

'कर्म'-कविता

 'कविता'

   

--- कर्म---

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 कर्म ही मानव जीवन

औरजीवन का आधार


 कर्म से उसकी सीरत

 कर्म से उसकी पहचान


 कर्म ही से पाए संतुष्टि 

 और खुशियां अपरंपार


 कर्म से ही उन्नति प्रगति

और दिलाए स्वच्छ प्रवृत्ति


 अच्छे कर्म ही है सत्कर्म

 जीव कला पाये निखार 


 कर्म ही शान आन बान

 कर्म से ही मान सम्मान


 कर्म जीवन की है रीत 

कर्म निभाये प्रेम  प्रीत


कर्म त्यागे सो दुःख पावें

सार्थक जीवन नहीं पावें 


 कर्म बिगड़े काज बनाए

घर बाहर वो इज्जत पाये


कर्म जीवन में उपयोगी 

न समझे आलसी भोगी।


शीला सिंह

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

कविता विधा - 'क्षणिका'

 कविता ---विधा --क्षणिका 


हे रमणी सौम्य

इतनी उदास क्यों बैठी 

चुप रहना दर्द सहना

शक्तिहीन कमजोर क्याें?

 बना रखदिया 

 निज भूमिका

 को अप्रकट।


      

हे रमणी सौम्या 

उठ, दहकते अंगारों को 

बना ले शीतल - मनभावन

तुच्छ मानसिकता रौंद 

जीवन सुखकर

तृप्ति पाकर।


 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

दीपावली -'दीपाें की अवली '

 

----------------------------------दीपों की अवली जगे ऐसे 

जग सारा रोशन हो जाए।


 कार्तिक अमां काली रात

 ज्योत प्रभा से नहा जाए।


 भर उल्लास  खुशी मनाएं

 शुभबेला मंगल गीत गाएं।


 सन्यासी सीताराम कोप से 

आज अयोध्या वापस आए


राम आराध्या माना सभी ने

वाे आदर्श माना किसी ने ?


 वर्षों पूजे राम दिखावा है?

चरित्र धारे नहीं छलावा है।


घरघर सीतागुण जाते गाये

लज्जित करते न संकुचाये


 अहिल्या बनी पत्थर मूरत

 कोई राम बन क्यों न आए


 शबरी जैसी भक्ति है कहां 

 मंदिर में ढोंगी ही अलसाए


 केवट जैसा सेवक न अब

 चपल स्वार्थी दांव लगाएं।


 राम  जैसा  वाे पुत्र  कहां 

 क्यों वृद्धाश्रम भरते जाएं?


लक्ष्मण जैसा भाई न मिले

घृणा के बन गए ऊंचे टीले।


 कुत्सित मन कब बदलेंगे?

 पाप छोड़ सन्मार्ग चलेंगे?


 हे 'राम 'शीघ्र लौट आओ

 आंसू दीनाें के पाैंछ जाओ


 अयोध्या फिर  बसाने को

 'तम'मन जोत जगाने को।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

दिवाली -'चलाे खुशियां मनाएं'

 कविता


चलो इस दिवाली 

एक नियम अपनाएं।


अंधेरा जहां दिखे 

दीप वहां भी जलाएं ।


कुटिया में बेबस पड़े 

किसी दीन को सहलाएं।


पहले टुकड़े मिठाई से

उसका मुंह मीठा करायें। 


कई दिनों से भूखा था

जो कुछ खाना दे आएं ।


नीरस सूखी आंखों मेंं

झलक खुशी भर आएं ।


 अपना समझ कर उसे

 अपनापन दिखा आएं।


अपने घर भी दिवाली

कुछ लौ उसे भी दे आएं।


मांने प्रभु का रूप उसे

आशीष अनोखी पाएं ।


 खुशियां भर के झोली

 चलो खुशियां मनाएं।


शीला सिंह 

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

'राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर'

 

मेरी कविता 12.11.2020

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देख  क्रंदन तेरा, मन आहत मेरा

ऊंची डाल नीड़ में,रहे बना बसेरा


तिनका तिनका जोड़, चोंचमें दबा 

रहता चिन्तनशील,ईक पल न गवा


बना घर सफल हुई सोची तरकीब 

संध्या ढलते विश्राम करते दो जीव

इक चुगता दाना दूजा अंडे सेता है 

सुखी बने गृहस्थी ,वो प्रण लेता है

इक भोर किरण दिनकर ने फैलाई

मधुर ध्वनि चींचीं चिंचीं दी सुनाई


छत पे बैठा था कागा घूर रहा था 

कब झपटूं  शिकार ताक रहा था 


कुछ पल देखा डगमगा गई डाली 

खा गया चूजे नीड़ रह गया खाली 


संध्या वेला दोनों पक्षी दौड़े आए

खाली देख नीड़ को भागे बौराए


विलाप करते दोनों अंबर गूंज उठा

ऐसा क्रंदन पीड़ा कि मन रो पड़ा।   


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

रंगाेली






सुंदर  रंगों से सजी ये रंगोली है

अलंकरण कला,बहुविकल्पी है।


पूजा व्रत त्योहारों में शोभा पाती

संस्कृति परंपरा की याद दिलाती।


विभिन्न आयामों को प्रदर्शित कर 

आकृति ज्यामितिक,दैविय पाती।


चावल, सिंदूर, रोली, हल्दी, आटा सजकर देहरी, आंगन शोभा पाता


रंग बिरंगे फूलों से सौन्दर्य अपार

जगमग दीप आलोकित घर द्वार।


अलपना, मंडणा कोलाम कहलाए 

सुखशान्ति ,समृद्धि ,सौभाग्य लाए


घर की लक्ष्मी बनाए खुशियां पाए

परंपरा जीवित रखे महत्व दर्शाएं।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

दिवाली खुशियों का त्योहार

 '

                         

       


 दिवाली खुशियों का त्योहार

 सुख वैभव समृद्धि का सार।


दीप जगा खुशियां पायें अपार

आलोकित हो मन भीतर बाहर।


चलो जरा उस कुटिया तक जायें 

क्यों पसरा अंध सन्नाटा देख आए


 अपने घर को हमने रोशन किया

 दीपक वहां भी जगा कर आए।


मिठाई पकवान जो घर में बने हैं

मुंह उनका भी मीठा करा आए।


भूख गरीबी की मार जो झेल रहे 

दुखड़ा उनका भी कुछ कम आएं। 


एक टक निहारे सूखी नीरस आंखें

उनमें आस मनोहारी भरके आए ।


सीमा का प्रहरी शहीद जो हुआथा

उस मां के दिल सांत्वना दे आए ।


 छूटा जिसका बुढ़ापे का सहारा

उस पिता का दुख कम कर आएं।


 सब मिल मनाए खुशी दिवाली

 न बेगानी ये दिवालीअपनो वाली।


आशीष दें खुशियां लाएं दिवाली

 झोली रहे न किसी की खाली ।



 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

गोवर्धन पूजा अन्नकूट त्यौहार

 


'गोवर्धन पूजा अन्नकूट त्यौहार'


कार्तिक मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा है आती,

प्राचीन हिंदू परंपरा गोवर्धन पूजा शोभा पाती।


प्रात तन तेल मालिश स्नान की परंपरा है,

विधि पूजन से कुलदेवता की अर्चना है।


कृष्ण भक्त मन में श्रद्धा भाव जगाते हैं,

विश्राम मुद्रा में पुरुष आकृति बनाते हैं।


सुरभि गौबछ से सुंदर गोवर्धन अचला,

योगेश्वर श्री कृष्ण प्रभु की मूरत सजाते हैं।



नाभि मध्य माटी का दीपक शोभा पाता,

दूध ,दही ,गंगाजल ,शहद और बताशा,


फूल,दूब ,पत्ते,डाली सजाकर

पूजा करते,

गोधन रहे रक्षित बृजवासी प्रार्थना है करते ।



गोवर्धन पूजा अति उत्तम और संस्कारी है,

धेनु पूजन पुष्पमाल सींग सिंदूरी शुभकारी है।

कथा कहें -अति दिव्य दिवस की चमत्कारी है,

जय जय श्री कृष्णा जो प्रभु विष्णु अवतारी है।



एक समय की बात, कृष्ण ग्वालों के साथ,

गोवर्धन पर्वत पर जाते ,गायों को चराते।

उत्सव मनाते बृजवासी ,इंद्र पानी बरसाते ,

भक्ति पाकर इंद्र ,झूठे घमंड में डूब जाते ।

मेरे जैसा बलवान न कोई दंभ अंह भर पाते

गोवर्धन पर्वत अलौकिक, दिव्य धाम,

पूजा हो प्रथम कृष्ण यही महत्ता बताते।

इंद्र दंभ शक्ति में चूर मेघ बरसाए भरपूर,

सप्त दिवस निरत सभी प्राण रक्षा आतुर।

गोप ग्वाले पशुधन समेत पानी तरने लगे,

जल में भरे हिचकोले हाहाकार करने लगे।

तब श्री कृष्ण प्रभु ले अवतार हुए प्रकट,

गोवर्धन उठाया कनिष्का अंगुली पर तुरंत।

सत्य जानकर इंद्र करे बारबार याचना, 

श्री कृष्ण तो विष्णु के अवतार सब ने माना।

खुश हुए और झूम उठे ब्रजवासी सभी,

गोवर्धन पूजा अन्नकूट पर्व परंपरा बनी तभी।



 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

( मेरी हर रचना मौलिक और स्वरचित होती है)🙏

'झारखंड स्थापना दिवस'

 🙏🇮🇳


          'कविता'    15.11.2020

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पन्द्रह नवंबर दिवस स्थापना झारखंड है,

बीस बरस का यौवन प्यारा झारखंड है।

वनों से आच्छादित 'वन क्षेत्र' झारखंड है,

पठार का हिस्सा छोटानागपुर झारखंड है।

झारखंड नाम इतिहास पुराना हर युग बदला है,

विष्णुपुराण मुंड वायुपुराण मुरंड मुगल कुकरा है।

जन हर्षित जब संसद में बिल पास हुआ

हॉकी खिलाड़ी जयपालसिंह का सपना पूर्ण हुआ।

चारो दिशा बंगाल ओडिशा बिहार उत्तर प्रदेश है,

चतुर्भुजी आकारी में ये  राज्य                      अवस्थित है।

सुंदर झरने नदी पहाड़ बन और पठार 

मानव निर्मित मंदिर उद्यान सौंदर्य भंडार।

भाषा संस्कृति धर्मों का संगम ये राज्य है,

आदिवासी अनूठा जीवन दर्शाता ये राज्य है।

'बेतला' उद्यान बाघ हाथी का संरक्षक है,

वन्य प्राणियों का आश्रय दाता ये राज्य है।

मन को सुकून देता नेतरहाट सनसेट पॉइंट,

पाइन फारैस्ट दलमावन मंगोलिया  प्वाइंट। 

टांगीनाथ धाम ऊंचे पहाड़ शोभा पाए,

हजार बागों का शहर हजारीबाग

कहलाए।

शिव का धाम देवघर दुमका में बासुकीनाथ,

रजरप्पा जगन्नाथ मंदिर इटखोट

बौद्धधाम।

देवी दुर्गा दिउड़ी शक्ति मंदिर और तमाड़,

जैन तीर्थस्थान शोभायमान है 

पारसनाथ।

खनिज पदार्थों से संपन्न यह तो झारखंड है,

चूना पत्थर तांबा लोहा कोयला बहु खनिज है।

वीर योद्धा बिरसा मुंडा की अमर कहानी है, 

सुनी जाती जो हर एक एक की जुबानी है। 

तीरकमान और भाला थामेहिम्मत दिखाई,

अंग्रेजों की बंदूकों तोपों के समक्ष वीरगति पाई। 

उस आदिवासी नायक  की आज जयंती है ,

जिसके बलिदानों से झारखंड गर्वित है।

आदिवासी बहुलीय ये राज्य झारखंड है,

हर वैभव गुणसंपदा युक्त ये राज्य झारखंड है।



शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

भाई दूज

 

 

   कविता 

 

कार्तिक मास शुक्ल पक्ष द्वितीय शुभ वार,

हिंदू संस्कृति परंपरा अनूठा पर्व त्यौहार ।


शुद्ध पवित्र आसन बिछा भाई को बिठाए,

सिंदूर ,अक्षत, पुष्प ,मीठा थाली में सजाएं।



बहन भाई के माथे पर तिलक लगाए,

बांध कलावा हाथ, मुंह मीठा कराए।



करे कामना भाई  रहे स्वस्थ, लंबी आयु पाए,

विघ्न बाधा दूर रहे और सुख मय

जीवन पाए।



संध्या बेला बहन चौमुखा दिया जलाए,

भाई की रक्षा हेतु दक्षिण दिशा दिखाएं।


स्नेह समर्पण भाई दूज पवित्र त्यौहार,

सुख समृद्धि खुशहाली रहे भाई

के घर द्वार।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

समाज में बेटियों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध "मेरी आवाज"

 

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 आज बेटियों के प्रति समाज का जो नजरिया बदल चुका है वह चिंता का विषय बन गया है । दिन प्रतिदिन बेटियों के प्रति बढ़ते हुए अपराध की गति ने पूरे समाज, राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है।  मानव समाज का यह घृणित चेहरा राक्षसी प्रवृत्ति से पूरी तरह ढक चुका है । इस घृणित मानसिकता के पीछे के कारणों को भी जानना आवश्यक है। भारतीय सभ्य समाज क्यों इतनी कुत्सित तस्वीर में बदल गया अति सोचनीय पहलू है। इस मानसिकता और इन अपराधों को रोकना आज हमारे समाज के लिए बहुत ही बड़ी चुनौती है क्योंकि हर संगीन अपराध के लिए कठोर से कठोर सजा का प्रावधान है फिर भी इस श्रेणी के अपराधों में कमी नहीं आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कानन एवं नियमाे की परिभाषा केवल कागजों तक ही सीमित रहती है वास्तव में अपराधी की  मानसिकता वैसी की वैसी ही रहती है । आज बेटियों के प्रति घृणित मानसिकता रखने वाले अपराधियों के मन में कानून का भय तनिक भी नहीं है इसलिए यह अति जरूरी हो जाता है कि अपराध करने से पहले अपराधी अपने कृत्य पर अवश्य विचार करें, कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए, जिसे सुनने मात्र से ही अपराधी का कलेजा कांप जाए। नियत अवधि पर मामलों का निपटारा हो लचीली व्यवस्था को  त्याग कर ही सही समय पर निर्णय दिया जाए।  अपराधी बेखौफ क्यों घूमते हैं यह चिंतन/ मनन का विषय है । कानून मजबूती के साथ लागू होना चाहिए  ।किसी संगीन अपराध में किसी भी प्रकार का पक्षपात, जातिवाद ,पार्टीवाद नहीं होना चाहिए  ।अपराधी के पीछे खड़ी हुई सहयोगी ताकत /मददगाराें पर प्रहार जब तक नहीं होगा अपराधी को कानून का भय नहीं होगा । आज यदि देखा जाए तो बेटियां कहीं भी सुरक्षित नहीं है दुर्भाग्यवश वह अपने परिवार के भीतर ही सुरक्षित नहीं है ,जिन पर सुरक्षा की जिम्मेदारी है वही अपराध को अंजाम दे रहे हैं ,यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है । क्या यह विकृत मानसिकता और कुसंस्कारों का परिणाम नहीं है? संस्कार परिवार से ही मिलते हैं अच्छे या बुरे । माता-पिता को चाहिए कि अपनी संतानों को सुसंस्कारी बनाएं समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाएं । भारतीय इतिहास गवाह है कि महिलाओं ने शुरू से ही अपने अस्तित्व व अधिकारों को पाने के लिए बहुत सी यातनाएं भी झेली है ,लड़ाई भी लड़ी है और विजय भी पाई है  ।लंबे समय बाद महिलाओं को कानून का साथ मिला और पुरुषों के समान अधिकार मिले परंतु विडंबना! महिलाएं अपने अधिकारों का प्रयोग कितना कर पाती है ?यह कोई नहीं जानता । कई बार पीड़ित बेटियों को सहायता से भी वंचित रहना पड़ता है न उन्हें समाज का सहारा मिलता है और न ही कानून का । सामाजिक संस्थाएं भी अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाती क्योंकि पुलिस, प्रशासन और अदालतों की पेचीदा गलियों का सफर बुरी तरह से थका देता है ,जिस कारण उनकी आवाज दबी रह जाती है। कानून होते हुए भी मदद नहीं मिलती । अतः बेटियों को हर तरह से सक्षम बनाना होगा । परिवार में मां की भूमिका अहम मानी जाती है इसकी शुरुआत परिवार से हो ।वेटी शैक्षिक और शारीरिक रूप से वलिष्ठ होगी तभी आर्थिक स्तर पर भी उन्नति करेगी। अपने अधिकारों को समझेगी तभी विकृत समाज की तस्वीर बदल पाएगी ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏05.11.2020

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बाल कविता

 ' बाल कविता'

           ------------------16.11.2020


देखो देखो नभ कैसा मुस्काया है

इंद्रधनुषी रंगों से खूब सुहाया है।


मन करे ऊंची छलांग उड़ जाऊं

एक रंग पकड़ कर तो ले आऊं। 


काले नीले बादल तो यूं मंडराते

कभी सिकुड़ते कभी फैल जाते।


ढक ले सूरज को अंधेरा कर जाते

हम सब छोटे बच्चे फिर डर जाते


तितली पकड़े शोर खूब मचाते हैं 

एक दूजे के पीछे भागे जाते हैं ।


संध्या हो गई मां चिंता करती होगी

छतपर जाकर नजर दौड़ाती होगी


 सतरंगी नभ मन मे बस गया मेरे

 कितने सुंदर हे इंद्रधनुषी रंग तेरे।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

अनिद्रा विकार

 


 'क्यों रात भर नींद नहीं आती/               नींद का गणित'

------- भरपूर 

नींद हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। दिन भर की थकान के बाद हर व्यक्ति यही चाहता है कि उसे अच्छी और भरपूर नींद आए। डॉक्टर के अनुसार रात में 7, 8 घंटे नींद अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है । लेकिन जब सोने पर भी नींद ही ना आए तो एक गंभीर समस्या की ओर इशारा माना जाना चाहिए। अनिन्द्रा पर अवश्य ध्यान देना चाहिए । इस बीमारी को अंग्रेजी में इनसोम्निया(Insomnia) कहा जाता है जिसके दो रूप है ,1.  एक्यूट इनसोम्निया- यहअनिन्द्रा 

का एक प्रकार है, यह समस्या कुछ दिनों या हफ्तों के लिए हो सकती है और उसके बाद सामान्य भी हो सकती है। काम का दबाव  कोई पारिवारिक चिंता , कोई घटना या अन्य कोई परिवारिक समस्या अनिन्द्रा का कारण बनती है । 2.  क्रॉनिक इनसोम्निया - अनिद्रा की समस्या गंभीर हो सकती है  क्योंकि यह समस्या महीने भर या इससे भी ज्यादा दिनों तक हो सकती है ।ये एक प्रकार के नींद संबंधी विकार है इसमें व्यक्ति को सोने में असुविधा नींद की कमी या नींद पूरी ना हो पाने की समस्या रहती है और ऐसा होने पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है अनेकों समस्याएं पैदा हो जाती है ।नींद में कमी कई तरह की परेशानियां पैदा कर सकती है - एकाग्रता में कमी, याददाश्त कम होना, आंखों के नीचे काले घेरे, पेट की गड़बड़ी, उल्टी ,चिड़चिड़ापन आदि समस्याएं हो सकती हैं। नींद ना आने के कई कारण हो सकते हैं,जैसे- चिंता और मानसिक अवसाद नींद ना आने की एक बहुत बड़ी वजह है। डिप्रैशन और नकारात्मक सोच के कारण भी कई बार नींद नहीं आती मानसिक और भावनात्मक असुरक्षा भी अनिद्रा की एक बड़ी वजह बनती है । कोई शारीरिक पीड़ा , दर्द हो तब भी अच्छी नींद में बाधा बनता है । ज्यादा मात्रा में और कई बार चाय कॉफी पीने से भी नींद कम आती है क्योंकि कैफीन को तो नींद का दुश्मन समझा जाता है। कुछ लोगों को ज्यादा रोशनी में सोने की आदत नहीं होती, ज्यादा रोशनी उनकी निंद्रा में बाधक बनती है। देर रात तक टीवी देखते रहना, और इंटरनेट से जुड़े रहना भी सोने का रूटीन बिगाड़ देता है  । अल्कोहल का सेवन करना, शराब सिगरेट पीना ,अत्यधिक नशा करना और नशा न मिलने की वजह से भी नींद नहीं आती है। कुछ लोग हमेशा चिड़चिड़ा स्वभाव के रहते हैं उदासीनता ऐसे लोगों को घेरे रखती है ऐसे लोगों को भी अनिन्द्रा की बीमारी होती है। इस प्रकार अनेको ऐसे उदाहरण हैं जो अनिद्रा का कारण बनते हैं। इसके लिए अपनी जीवनशैली में सुधार लाना आवश्यक है,अपनी आदतों को बदलना जरूरी है। चिंता और मानसिक अवसाद को अपने से दूर रख कर अच्छी नींद का आनंद लिया जा सकता है। समय पर सोने और जागने की आदत डालनी चाहिए। हम सोते समय किसी समस्या को लेकर चिंता में न रहें । किसी प्रकार का शारीरिक दर्द या पीड़ा है तो समय रहते उसका इलाज कराएं।

 सदा अच्छा सोचे और सकारात्मक सोच बनाए रखें बुरी आदतों को अपने जीवन में न आने दे। लोभ ,लालच ,ईर्ष्या ,घृणा ,प्रतिशोध हिंसा जैसे दुर्गुणों को त्याग कर सदैव कर्मशील बनते हुए अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए । शुद्ध विचारों को आत्मसात करते हुए परोपकारी भावना को अपनाया जाए तो जीवन सुखमय बनता है सुखमय जीवन ही अच्छी नींद प्रदान करता है।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

देश प्रेम

 


     देश प्रेम 

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17.11.2020


ए मेरे देश की माटी सौगंध तेरी 

तेरी रक्षा में समर्पित जान मेरी।


 बचपन ममतामयी गोद बिताया 

 सोंधी सोंधी खुशबू में मैं नहाया ।



खेतखलिहान बैलसंग हल चलाते

अनाज उगाते जीवन निर्वाह पाते।


हे भू मातृ तू जग पालनहारी सदा जीवनमरण का बंधन तुझसे यहां।


सोंचू तेरा कैसे कर्ज मैं चुकाऊंगा

रक्षण करने मैं सीमा पर जाऊंगा।


मैं माटी पुतला माटी ही में पला हूं 

पूरा करुं  कर्तव्य प्रण पर अड़ा हूं


भाल तिलक मिट्टी को नमन करूं

कुदृष्टि डालें दुश्मन पर घात करूं।


सच्चा प्रेम बलिदान त्याग समर्पण तन मन धन सब कुछ तुझेअर्पण।


देश प्रेम अब दिल में जाग चुका है

जन्मभू बने स्वर्ग मन ठान चुका है

 

 'मेरा भारत देश महान'


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

Saturday, November 7, 2020

चुप रहना अन्याय सहना

 समय, परिस्थिति, वातावरण , घटना,  प्रसंग  और किसी अनुकूलित विषय के आधार पर चुप रहना जीवन जीने की कला है, परंतु यह कला- प्रतिभा 'अति चुप 'की ओर न धकेले । फिर जीवन जीना कठिन हो जाता है । 'चुप रहना' और 'जुर्म सहना 'दो अलग-अलग बातें हैं  । जहां घर ,परिवार और रिश्तो को संवारने , हितार्थ अथवा कल्याणप्रद  प्रसंग आता है , वहां चुप रहना हमारे अच्छे संस्कारों की ओर इंगित करता है । लेकिन बिना किसी कारण अन्याय ,जुर्म ,दबाव सहना अहितकर होता है । कहा भी गया है---' कि अन्याय करने वाला तो अपराधी होता ही है परंतु अन्याय को सहन करने वाला उससे बड़ा अपराधी है।' परिवार ,समाज में रहकर जुर्म सहते हुए चुप्पी साधे रहना एक विकृत मानसिकता और घृणित परिपाटी को जन्म देने का कारण बनता है । बचपन से लेकर युवा अवस्था तक अन्याय सहते रहना और चुप रहना किसी भी स्त्री या पुरुष में 'दब्बूपन' का भाव पैदा कर देता है । दबी मानसिकता से युक्त प्राणी कभी भी आत्महितार्थ हेतु जागृत भाव  आत्मसात नहीं कर पाता। कई बार रिश्तो को बचाना बहुत आवश्यक हो जाता है जिस कारण हम चुप रहना अच्छा मानते हैं, और अन्याय सहन करते हैं परंतु इस दुर्भावना की आदत  को हावी नहीं होने देना चाहिए । जुर्म करने वाला इसे हमारी कमजोरी/ बेवकूफी मानता है  और जुर्म करने वाले के हौसले बढ़ते जाते हैं । अतः समय ,परिस्थिति और प्रसंग को ध्यान में रखते हुए हमें आत्म- निर्णय लेने में सक्षम अवश्य होना चाहिए ।

 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

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Thursday, November 5, 2020

जीवन में आदतों का प्रभाव

 आदतें जिंदगी से बड़ी कभी नहीं हो सकती, क्योंकि "जीवन में आदतें होती है, जीवन आदतों में नहीं होता । "

 व्यक्ति के जीवन में आदतें समाहित होती है चाहे वह अच्छी हो या बुरी। अच्छी आदतें जीवन में श्रेष्ठ परिवर्तन लाती हैं ,वहीं बुरी आदतें जीवन को बर्बाद भी कर देती है । अच्छी आदतें जीवन को सरल, सुखमय बनाती हैं जबकि बुरी आदतें कष्टमय बनाती हैं । 

कुछ आदतें सरल होती हैं और कुछ जटिल।

   लेकिन जटिल आदतें हमारे जीवन में विशेष प्रभाव डालती हैं।  जीवन में जो आदते हमें हानी या कष्ट झेलने पर विवश कर रही हैं उन्हें त्याज्य मानना चाहिए,  इन्हें अपनाना श्रेयाकर नहीं होता। 

कुछ आदतें जैसे बात बात पर किसी को शर्मिंदा करना ,व्यंग्य करना अर्थात उपहास मजाक उड़ाना, दूसरों को छोटा समझना या हेय दृष्टि से देखना, ईर्ष्या ,घृणा का भाव रखना, ज्यादा बोलना, बात बात पर दूसरों को टोकते रहना, ये ऐसी आदतें हैं जो घर, परिवार, समाज ,मित्रों ,रिश्तेदारों में परस्पर शत्रुता का भाव पैदा करती हैं । 

किसी भी व्यक्ति को इन आदतों को अपने जीवन पर हावी नहीं होने देना चाहिए । स्कारात्मक सोच से युक्त आदतें अच्छी आदतें हैं । समय और कर्म की महत्ता जानना ,आगे बढ़ने की होड़, तरक्की उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने का जुनून , मानवीय गुण /परोपकार की भावना से युक्त स्वभाव/ प्रवृत्ति  जीवन में खुशहाली भरती है। लेकिन ज्यादा अंश में कोई भी आदत जीवन पर ज्यादा प्रभाव डालती है। आदतों के अनुरूप जीवन नहीं चलाया जा सकता जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती है आदतें । दृढ़ता के साथ उनमें परिवर्तन लाया जा सकता है ।


 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

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Wednesday, November 4, 2020

चाैथ का चांद

 'करवा चौथ का चांद'

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ऐ चांद तुम जल्दी आना मुझे दर्श दिखाना,

दिनभर की भूखी प्यासी अब देर न लगाना।

ऐ चांद तुम जल्दी आना मुझे दर्श दिखाना।


मेहंदी सजी है हाथ और चूड़ी कंगन है,

सुर्ख लाल साड़ी पांव में छनकती पायल है।


माथे पर टीका सोहे ,बालों में गजरा लगा है ,

नाक में सुंदर नथनी ,आंखों में कजरा लगा है।


थाली सजी है पूजा की हाथ में करवा लिया है,

मांगू मैं वरदान हमेशा साथ सजन जिय का है।

सुखी गृहस्थी  ,लंबी आयु व्रत का प्रण लिया है।

सात जन्म का साथ निभाऊं दृढ़ हठ किया है।


ऐ चांद कहीं छुप न जाना जाकर बादलों में तू,

इक चांद है संग मेरे दूजा चांद गगन में तू।


चांद से मांगूं खुशी ,अपने इस चांद के लिए ,

सुहागिन अरमान भरो मनभावन पिया के लिए।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 

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चाैथ का चांद

 'चौथ का चांद'

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चांद चौथ का मन बड़ा लुभाए आज,

मंदचाल मस्त भाव क्यों ललचाए आज?


ध्यान समाया मन तारों के संग जागी,

उल्लासित, मतवाली  प्रेम प्रीत है लागी।


व्रत संकल्प सौभाग्य हेतु

बन निराहारी,

मोहनी मूुरत पिया की देख

जाऊं बलिहारी।


आज दिवस ,शुभ मंगल शुभता लाया है,

प्रेयसी मैं ,पिया की दुल्हन रूप सजाया है।


मैं कोमलांगी ,सुखी गृहस्थी  तीव्राशी हूं,

हे पावन 'चंद्र' तेरे दर्शन की प्यासी हूं ।


छलनी भीतर तुझे टक टक निहारूंगी,

फिर अपने सजन की नजर उतारूंगी।


मांगूगी वरदान ,मैं बन रहूं सौभाग्यवती,

रहे निरोगी ,स्वस्थ दीर्घायु मेरे पति।


हर साल बाट जोहै नैनन ये 

तोरी,

करजाेड़ मैं प्रार्थी रक्षित रहे हमारी जोड़ी। 


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

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नारीत्व, समाज भारतीय संस्कृति

 नारी एक शक्ति है -सृजन की शक्ति ,निर्माण की शक्ति । भारतीय संस्कृति में नारी को 'मां 'का स्थान दिया गया है उसे देवी रूप माना गया है। पौराणिक ग्रंथ 'नारी ', 'देवी ', 'मां 'को आदर्श मानते हुए उसकी महत्ता को दर्शाते हुए असंख्या लेखों से पन्ने भरे हुए हैं। उसे पूजनीय माना गया है। उसके कोमल /कठोर रूपों का वर्णन किया गया है । शक्ति रूपा नारी जिस रूप में प्रकट होती है ,वह उसी रूप में परिलक्षित होती है  ।ममतामयी नारी जब अपने बालक को दूध पिलाती है तो वह वात्सल्य का साकार रूप प्राप्त कर लेती है । वह आदि शक्ति पालन हारी बन जाती है। प्रेम पुंज की स्वामिनी वह नारी मातृत्व भाव से ओतप्रोत हो जाती है। 'शक्ति 'सहन शक्ति के घेरे में विचरण करती है। सुकोमल संवेदनाओं के संग सृष्टि में सौंदर्य भरती र्है ।

लेकिन जब उसके अस्तित्व से खिलवाड़ होता है ,मर्यादा भंग होती है, आदर सम्मान खंडित होता है ,तब वह असुरों, पापियों  दुष्कर्मीयों का वध करने हेतु दुर्गा और काली का रूप धारण कर लेती है फिर उसके साहस और बल  के समक्ष कोई नहीं टिक पाता है । यह टिप्पणी हमारे पौराणिक ग्रंथों के आधार पर है । आज सृजन की इस शक्ति को मनुष्य की इस राक्षस वृत्ति /सोच ने मर्यादा के घेरे को तोड़ दिया है ।

 हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है भले ही नारी अनेक अधिकारों से लैस है परंतु फिर भी उसे उपभोग की वस्तु मानकर आज बाजार में खड़ा कर दिया गया है ।जितने अत्याचार ,अपमान व शोषण उस पर ढाये गए हैं संभवत किसी सदी में किसी पर भी इतने नहीं किए गए होंगे ।इतना होने के बावजूद आज वह जीवित है यह संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है । क्या नारी केवल उपभोग की वस्तु और पेट -प्रजनन तक ही सीमित है ?उसका अपना कोई प्रभुत्व,अस्तित्व नहीं है । यह प्रश्न सदियों सदियों से उठते आए हैं। नारी सुधार के अनेकों सुझाव मिले ,प्रयास हुए ,कानून बने लेकिन आज स्थिति बद से बदतर हो रही है । इसके लिए जिम्मेदार हमारा समाज ,परिवार वो मां बाप जिन्होंने अपनी संतानों को अच्छे संस्कार नहीं दिए । इस भटकन पर नकेल बहुत जरूरी है । संस्कार प्रथमतय पारिवारिक फिर शैक्षिक आधार पर जरूरी माने गए हैं । समाज को सुधारने से पहले घर ,परिवार को सुधारने की जरूरत है ,उस राक्षस वृत्ति ,सोच को खत्म करने की 

 जरूरत है  ,जो मां ,बहन ,वेटी के पवित्र रिश्तों पर धूल ओढ़ा चुकी है।  

 भारतीय संस्कृति की बात करें तो नारी का स्थान सदा से ही गौरवपूर्ण रहा है मानव जाति के सृजन ,विकास, पोषण और संरक्षण का दायित्व भी नारी के हिस्से में ही रहा है ।ईश्वर ने नारी और पुरुष की रचना साथ ही की है फिर भी पुरुष और नारी सामाजिक आर्थिक राजनीतिक व धार्मिक स्थिति में नारी के बदले पुरुष का स्थान उच्च क्यों माना जाता है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जो इस ब्रह्मांड को संचालित करने वाले विधाता है उसकी प्रतिनिधि नारी ही है अर्थात संपूर्ण सृष्टि ही नारी है। अतः भारतीय संस्कृति में तो स्त्री ही सृष्टि की समग्र अधिष्ठात्री है ,पूरी सृष्टि की स्त्री है क्योंकि इस सृष्टि में बुद्धि  निंद्रा ,सुधा ,छाया ,शक्ति ,तृष्णा जाति, लज्जा ,शांति ,श्रद्धा ,चेतना और लक्ष्मी आदि अनेक रूपों में स्त्री ही व्याप्त है । सहनशीलता का भाव उसमें अद्भुत है। पुरुषों से ज्यादा गुण ,विशेषताएं नारी में पाई जाती है । स्नेहशील पूर्ण हृदया उसकी बुद्धि में भी प्रभावी रहता है तभी तो गर्भधारण से पालन पोषण तक अनेकों कष्ट सहकर भी उसे आनंद की अनुभूति होती है । नारी भाव-प्रधान है। पिता ,पति ,पुत्र व परिजनों के प्रति स्नेहयुक्त शुभभाव रखती है। क्या आज की नारी घर, परिवार ,समाज की जरूरत बन गई है । पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना उसकी सीमा बन गई है । आज की नारी तो घर परिवार के साथ साथ आर्थिक स्तर पर भी मजबूत होती जा रही है। वह आत्मनिर्भर है , कर्तव्य निभाती है क्या अपने हकों की अधिकारिणी नहीं है । फिर क्यों वह सक्षम होते हुए भी अबला मान ली जाती है, उसका शोषण ,तिरस्कार होता है । देवी रूप है तो हर दृष्टि देविय दृष्टि क्यों नहीं? क्यों धार्मिक अनुष्ठानों में दिखावा /दिखावे का सहारा लिया जाता है । नारी शक्ति ,देवी शक्ति महिमा का गुणगान किया जाता है नवरात्रों में कन्या पूजन किया जाता है, क्यों? क्या यह मनुष्य की मजबूरी है? दिखावे का आवरण ओढ़ कर जिस नारी शक्ति की पूजा की जाती है पर्दे के पीछे उसकी दशा इतनी दयनीय क्यों है? आज जरूरत है उस कुंठित मानसिकता को सुधारने की । मन में व्याप्त अंधकार को दूर करके प्रकाशमान करने की ।

नारी के प्रति हर व्यक्ति के हृदय में पवित्र ,सच्ची भावना का होना अति आवश्यक है। नारी सुरक्षित ,समाज सुरक्षित तभी राष्ट्र सुरक्षित और उन्नत हो पायेगा ।


शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏

04.11.2020

मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...