कविता ---विधा --क्षणिका
हे रमणी सौम्य
इतनी उदास क्यों बैठी
चुप रहना दर्द सहना
शक्तिहीन कमजोर क्याें?
बना रखदिया
निज भूमिका
को अप्रकट।
हे रमणी सौम्या
उठ, दहकते अंगारों को
बना ले शीतल - मनभावन
तुच्छ मानसिकता रौंद
जीवन सुखकर
तृप्ति पाकर।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏
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