Saturday, November 7, 2020

चुप रहना अन्याय सहना

 समय, परिस्थिति, वातावरण , घटना,  प्रसंग  और किसी अनुकूलित विषय के आधार पर चुप रहना जीवन जीने की कला है, परंतु यह कला- प्रतिभा 'अति चुप 'की ओर न धकेले । फिर जीवन जीना कठिन हो जाता है । 'चुप रहना' और 'जुर्म सहना 'दो अलग-अलग बातें हैं  । जहां घर ,परिवार और रिश्तो को संवारने , हितार्थ अथवा कल्याणप्रद  प्रसंग आता है , वहां चुप रहना हमारे अच्छे संस्कारों की ओर इंगित करता है । लेकिन बिना किसी कारण अन्याय ,जुर्म ,दबाव सहना अहितकर होता है । कहा भी गया है---' कि अन्याय करने वाला तो अपराधी होता ही है परंतु अन्याय को सहन करने वाला उससे बड़ा अपराधी है।' परिवार ,समाज में रहकर जुर्म सहते हुए चुप्पी साधे रहना एक विकृत मानसिकता और घृणित परिपाटी को जन्म देने का कारण बनता है । बचपन से लेकर युवा अवस्था तक अन्याय सहते रहना और चुप रहना किसी भी स्त्री या पुरुष में 'दब्बूपन' का भाव पैदा कर देता है । दबी मानसिकता से युक्त प्राणी कभी भी आत्महितार्थ हेतु जागृत भाव  आत्मसात नहीं कर पाता। कई बार रिश्तो को बचाना बहुत आवश्यक हो जाता है जिस कारण हम चुप रहना अच्छा मानते हैं, और अन्याय सहन करते हैं परंतु इस दुर्भावना की आदत  को हावी नहीं होने देना चाहिए । जुर्म करने वाला इसे हमारी कमजोरी/ बेवकूफी मानता है  और जुर्म करने वाले के हौसले बढ़ते जाते हैं । अतः समय ,परिस्थिति और प्रसंग को ध्यान में रखते हुए हमें आत्म- निर्णय लेने में सक्षम अवश्य होना चाहिए ।

 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

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