Wednesday, November 18, 2020

कहानी-=घर-घर में निराश बागवां

 घर-घर में निराश बागवा 

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 पिताजी के कमरे में घोर सन्नाटा, एकदम अंधेरा था-  मैंने जैसे ही घर में प्रवेश किया सीधी नजर पिताजी के कमरे पर पड़ी । कमरे में प्रवेश करते ही मैंने बिजली का स्विच दबाया देखा -सामने पिताजी कुर्सी पर बैठे किसी सोच में डूबे हुए थे । मैंने झट से पूछा- पिताजी क्या बात है ",जब से मां गई है तब से आप गुमसुम ही रहते हैं कुछ अपने स्वास्थ्य का ध्यान भी रखो ।"

 पिताजी जैसे ही चिर निद्रा से उठे हो बेटीे की आवाज सुनकर उसकी तरफ दृष्टि दौड़ाई और कहने लगे-  नहीं बेटी! " मैं ठीक हूं बस कल के सफर की तैयारी के बारे में सोच रहा था।"

 कल के सफर के बारे में ! कैसा सफर  ? बेटी ने बड़ी हैरानी से पूछा ।

'बेटी '  -' यहां दो महीने पूरे हो गए हैं आज ,कल से दूसरे बेटे के पास रहना है।'

 बेटी अपने पिता के प्रति सहानुभूति दिखाती हुई अपने भाइयों को बुरा -भला कहने लगी कि' इनका भी वैसा ही समय आएगा जैसा आज आपका है'

 जायदाद के मालिक भी यही है मैंने तो अपना हिस्सा इन्हें दे दिया है, ताकि मेरा अपने मायके में आना-जाना इज्जत से बना रहे।

 पिताजी बोले-' बेटी ' भगवान 'बेटों 'को इसलिए जन्म देते हैं ताकि वह अपने मां-बाप का सहारा बने । मगर वाेह सब कुछ भूल जाते हैं  ।बेटियां मां-बाप की सबसे बड़ी ' ' ' 'हमदर्द 'होती हैं । उनके दुःख /पीड़ा को  समझतेी  हैं ।

 पिताजी के चेहरे पर थोड़ी देर के लिए -संतोष भाव जागा  और वे तनिक 'मुस्कुराए 'कहने लगे-' बेटी ' अपने मां-बाप के प्रति तुम्हारे ह्रदय में जो हमदर्दी है वह प्रशंसनीय है, मैंने तुम्हें भी बेटों की तरह ही पाला है और अच्छे संस्कार दिए हैं ।

 बेटी थोड़ी देर चुप रहती है फिर कहती है--

 पिताजी-  मैं भी आपकी  देखभाल कर सकती हूं मगर दाे दिन बाद बुड्ढे - बुड्ढी को अपने पास रखने की हमारी बारी है ,मेरे पति और इनके तीनो भाई अपने मां-बाप को तीन-तीन महीने अपने पास रखते हैं , अभी बेटी अपना वाक्य पूरा ही कर रही थी कि पिताजी बड़ी हैरानी से अपनी बेटी की तरफ देखते हैं और कहते हैं !- 'बेटी' तुम लोगों ने भी यही नियम अपनाया है   

  'कहते हैं बेटों की अपेक्षा बेटी बहुत संस्कारी होती है जो बड़ों के प्रति आदर और सेवा भाव रखती है वाे चाहे उसके अपने मां-बाप हो या सास-ससुर' 


 पिताजी को लग रहा था कि आज वह सारी संस्कारी परवरिश 'बालू रेत' की भांति हाथ से फिसलती जा रही थी, जो हवा के एक झोंके से अपनी पहचान तक गंवा देती है ।


 यह सोचते-सोचते पिताजी फिर अपना सामान समेटने लगे अगले कल के सफर की तैयारी के लिए ।


🙏

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