Wednesday, November 18, 2020

समाज में बेटियों के साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध "मेरी आवाज"

 

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 आज बेटियों के प्रति समाज का जो नजरिया बदल चुका है वह चिंता का विषय बन गया है । दिन प्रतिदिन बेटियों के प्रति बढ़ते हुए अपराध की गति ने पूरे समाज, राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है।  मानव समाज का यह घृणित चेहरा राक्षसी प्रवृत्ति से पूरी तरह ढक चुका है । इस घृणित मानसिकता के पीछे के कारणों को भी जानना आवश्यक है। भारतीय सभ्य समाज क्यों इतनी कुत्सित तस्वीर में बदल गया अति सोचनीय पहलू है। इस मानसिकता और इन अपराधों को रोकना आज हमारे समाज के लिए बहुत ही बड़ी चुनौती है क्योंकि हर संगीन अपराध के लिए कठोर से कठोर सजा का प्रावधान है फिर भी इस श्रेणी के अपराधों में कमी नहीं आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कानन एवं नियमाे की परिभाषा केवल कागजों तक ही सीमित रहती है वास्तव में अपराधी की  मानसिकता वैसी की वैसी ही रहती है । आज बेटियों के प्रति घृणित मानसिकता रखने वाले अपराधियों के मन में कानून का भय तनिक भी नहीं है इसलिए यह अति जरूरी हो जाता है कि अपराध करने से पहले अपराधी अपने कृत्य पर अवश्य विचार करें, कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए, जिसे सुनने मात्र से ही अपराधी का कलेजा कांप जाए। नियत अवधि पर मामलों का निपटारा हो लचीली व्यवस्था को  त्याग कर ही सही समय पर निर्णय दिया जाए।  अपराधी बेखौफ क्यों घूमते हैं यह चिंतन/ मनन का विषय है । कानून मजबूती के साथ लागू होना चाहिए  ।किसी संगीन अपराध में किसी भी प्रकार का पक्षपात, जातिवाद ,पार्टीवाद नहीं होना चाहिए  ।अपराधी के पीछे खड़ी हुई सहयोगी ताकत /मददगाराें पर प्रहार जब तक नहीं होगा अपराधी को कानून का भय नहीं होगा । आज यदि देखा जाए तो बेटियां कहीं भी सुरक्षित नहीं है दुर्भाग्यवश वह अपने परिवार के भीतर ही सुरक्षित नहीं है ,जिन पर सुरक्षा की जिम्मेदारी है वही अपराध को अंजाम दे रहे हैं ,यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है । क्या यह विकृत मानसिकता और कुसंस्कारों का परिणाम नहीं है? संस्कार परिवार से ही मिलते हैं अच्छे या बुरे । माता-पिता को चाहिए कि अपनी संतानों को सुसंस्कारी बनाएं समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाएं । भारतीय इतिहास गवाह है कि महिलाओं ने शुरू से ही अपने अस्तित्व व अधिकारों को पाने के लिए बहुत सी यातनाएं भी झेली है ,लड़ाई भी लड़ी है और विजय भी पाई है  ।लंबे समय बाद महिलाओं को कानून का साथ मिला और पुरुषों के समान अधिकार मिले परंतु विडंबना! महिलाएं अपने अधिकारों का प्रयोग कितना कर पाती है ?यह कोई नहीं जानता । कई बार पीड़ित बेटियों को सहायता से भी वंचित रहना पड़ता है न उन्हें समाज का सहारा मिलता है और न ही कानून का । सामाजिक संस्थाएं भी अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पाती क्योंकि पुलिस, प्रशासन और अदालतों की पेचीदा गलियों का सफर बुरी तरह से थका देता है ,जिस कारण उनकी आवाज दबी रह जाती है। कानून होते हुए भी मदद नहीं मिलती । अतः बेटियों को हर तरह से सक्षम बनाना होगा । परिवार में मां की भूमिका अहम मानी जाती है इसकी शुरुआत परिवार से हो ।वेटी शैक्षिक और शारीरिक रूप से वलिष्ठ होगी तभी आर्थिक स्तर पर भी उन्नति करेगी। अपने अधिकारों को समझेगी तभी विकृत समाज की तस्वीर बदल पाएगी ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏05.11.2020

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