Saturday, October 24, 2020

भराेसे के बल कर्म का सरोकार

 क्या भरोसे के बल पर कर्म सरोकार होता है? इस विषय पर भिन्न-भिन्न अर्थ और विचारों के आधार पर इसे परिभाषित किया जा सकता है  ।सर्वप्रथम भरोसा  अर्थात विश्वास जो व्यक्ति, घटना, समय, स्थिति, परिस्थिति और वातावरण के अनुसार अपनी भूमिका एवं महत्त्व दर्शाता है ।

 भरोसा मन की ताकत है। जब हम किसी सच्चे इंसान पर भरोसा करते हैं तो अपने कर्म भी सहज/आसान कर लेते हैं  । मुश्किलों /समस्याओं पर काबू पा लेते हैं और अपने काम अथवा कर्म को पूर्णता प्रदान करते हैं ।


 भरोसे के बल पर मनुष्य कठिन से कठिन काम भी आसानी से कर लेता है । किसी काम के प्रति लगन, उत्साह, उत्तेजना, मजबूती , हिम्मत , हृदय में बसे भरोसे की ही उपज होते हैं   ।भरोसा व्यक्ति को कर्मठ बनाता है, आशावान और महत्वाकांक्षी बनाता है।


 परिवार में माता-पिता अपनी संतान के हृदय में भरोसे का भाव भरते हैं परिणामस्वरूप संतान मेहनत के बल पर सफलता के मार्ग पर अग्रसर होती है । भरोसा केवल अच्छे कार्यों को लेकर होना चाहिए । श्रेष्ठ गुणों से युक्त मां-बाप का भरोसा संतान को जीने की राह दिखाता है । मुसीबत या संकट के समय आत्मरक्षा करना सिखाता है  ।कर्म के प्रति कर्तव्यवान बनाता है । कर्म यदि जीवन का आधार है तो भरोसा उसे पुष्ट करता है । 


मानव जीवन में कर्म की पूर्णता या सार्थकता मुख्य रूप सेअपने आप के भरोसे पर टिकी है । स्वयं पर भरोसा सर्वश्रेष्ठ है  क्योंकि आत्मविश्वास ही जीवन को सफल बनाता है। कहा भी गया है --'मन के हारे हार ,मन के जीते जीत।' अपने आप से भरोसे अथवा विश्वास को खो देना अकर्मण्यता  सिद्ध करता है । आलस्य और अनिश्चितता भरोसे और विश्वास के शत्रु है  जो  मनुष्य को कर्म हीन और अकर्मण्य बनाते हैं ।  कर्म की सार्थकता भरोसे और विश्वास पर ही टिकी है । एक योग्य शिक्षक  आत्मविश्वास के आधार पर ही ज्ञान अर्जन करके ही शिक्षक धर्म निभाता हैं । क्योंकि शिक्षण कर्म से उसका सरोकार है । उसका कर्तव्य है  अतः उसके ज्ञान की नींव भरोसे पर ही टिकी है जो उसके हृदय में विद्यमान है । यदि वह अपने कर्म के प्रति अनिश्चितता ,अनभिज्ञता दिखाता  तो  शिक्षण कर्म पूर्ण नहीं हो पाता ।


 इसीलिए किसी भी कर्म की डोर हृदय में स्थित भरोसे से बंधी है । अकर्मण्यता, निराशा, हताशा, आलस्य , अनिश्चितता उस भरोसे रूपी डोर को कमजोर करते हैं । यह भी माना  गया है कि भरोसे पर ही दुनिया के काम टिके है  लेकिन उसमें जरूरत है तो केवल सबलता की कर्मठता , क्रियाशीलता और सक्रियता की। 


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश🙏

Thursday, October 22, 2020

समुद्र को सीख

 "समुद्र को सीख"


 जिन किनारों ने बांध रखा है समुद्र को अपनी सीमाओं में,

 घाव की वेदना उनको भी सहनी पड़ी है सदियों सदियों से ।

 डूब जाती है वह कश्तियां बीच मझधार में,७

 दमन समुद्र का पकड़ जीती है जो एहसास में ।

 किनारे चाहे कितनी भी मजबूती में खड़े हो,

 धाराओं को अपने आंचल में समेटे अड़े हो ।

 समुद्र की उथल-पुथल जब हाहाकार मचाती है,

 अपने अस्तित्व को खोकर धारा को भटकाती है ।

 मोड़ देती है विपरीत दिशाओं में दिशाहीन बनाकर,

 किनारों को दफन कर जाती है अंतहीन क्रूरता अपनाकर ।

 जब वेग शांत हो जाता है सब कुछ बर्बाद हो जाता है,

 टूटा किनारा भी फिर अपनी शक्ल में कहां आ पाता है?

 ए समुद्र ना कर गुरुर अपने इस मिथ्या पर पर,

 उन नदियों की भागीदारी मत भूल जो करती तुम्हें सबल ।

 वहां जननी सहस्त्राें सफर तय कर करती तुम्हें पोषण,

 भंडारण स्थापित कर ना कर बंधन का तू शोषण ।

 कितने सपनों को तोड़ा, सहस्त्र प्राणों से खेला है,

 विस्तृत ,विशाल आकार पाकर भी तू अकेला है ।

 नदियां गतिशील है धारा के प्रवाह में बहती है,

 मानव समाज सबका सिंचन, कहानी को बयां करती है ।

 किनारों के बंधन में बहना और अनुशासन सिखाती है,

 औरों पर समर्पित है, आत्मचिंतन कहां कर पाती है ?


 धन्यवाद ।

 स्वरचित कविता ।


 शीला सिंह

अध्यक्षा 

 महिला साहित्यकार संस्था जिला बिलासपुर इकाई हिमाचल प्रदेश ।

Wednesday, October 21, 2020

स्वार्थ रहित जीवन

 मानव जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है  शास्त्रों में भी यही कहा गया है कि साै हाथों से कमाने और हजार हाथों से दान करने की नीति  की प्रवृत्ति हर मनुष्य को अपनानी चाहिए । युग निर्माण संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है ।

 मिल बांट कर खाना, सभी का सहयोगी बने रहना परोपकार की भावना के आधार पर जीवन जीना सर्वश्रेष्ठ माना गया है । स्वार्थ रहित जीवन जीने को सर्वोत्तम जीवन माना गया है । 

स्वार्थी भावना सदैव सद्गुणों की शत्रु रही है । मनुष्य आत्म केंद्रित जीवन जीता हुआ केवल आत्म सुख की लालसा रखता है । घर परिवार समाज व राष्ट्र के लिए अनुपयोगी ही रहता है । 

सार्थक जीवन से परे रहकर ईर्ष्या द्वेष अलगाववाद जैसे दुर्गुणों से घिरा रहता है ।  

मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है बार-बार नहीं मिलता। प्रेरणादाई जीवन सभी के लिए अनुकरणीय बनता है  ।इस संसार में सत्कर्म ,परमार्थ और उपकार के अनेक  कार्य है मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए सदैव मानव कल्याण की भावना से ओतप्रोत जीवन होना चाहिए। 

 सत्कर्म सद्भावना रहित केवल ढोंग ही माना जाता है । परमार्थ का आडंबर  न  अपना कर वास्तविक उपकारी भाव अपनाना सदा श्रेयकर रहता है । संसार में आज बुराइयां इसलिए बढ़ रही हैं या फल-फूल रही है क्योंकि  अधिकतर मानवता स्वार्थ के घेरे में गिरी हुई है । परमार्थ के बल पर बड़ी-बड़ी संस्थाएं, धर्म प्रचारक  झूठ और दिखावे का आवरण ओढ़ कर ज्ञान बांट रहे हैं  भीतरी ज्ञान खोखला है  स्वार्थ की भावना तीव्र है । झूठ ,बेईमानी और व्यभिचार पर नियत टिकी है । झूठी शान अपनी चमक बिखेर रही है पर्दे के पीछे पाप पनप रहा है । मर्यादाहीन और बे हयाई जीवन का प्रयाय बन चुका है । बेईमानों की भीड़ में जन हितेषी ढूंढना मुश्किल है ।

 इसके विपरीत स्वार्थ रहित जीवन सर्वश्रेष्ठ श्रेणी में आता है । स्वार्थ रहित व्यक्ति परमार्थ और परोपकार की भावना की परिभाषा को भलीभांति समझता है । जनकल्याण के आधार पर जीवन की सार्थकता को मुख्यता देता है । आडंबर और दिखावे से दूर रहकर केवल और केवल कल्याणकारी भावना को अपनाता है । अतः स्वार्थ से दूर रहकर ही जीवन श्रेष्ठ कहलाता है ।

  शीला सिंह

 बिलासपुर

 हिमाचल प्रदेश🙏

Sunday, October 18, 2020

विनम्रता

 ' विनम्रता '

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 विनम्रता हृदय का भाव है ।विनम्रता श्रद्धा और विश्वास की अनुगामिनी होती है ,जिसका सीधा संबंध मन से जुड़ा है । विनम्रता का भाव व्यक्ति के हृदय में उपजता कैसे है ? सर्वप्रथम यह जानना बहुत जरूरी है  । यह गुण अथवा लक्षण व्यक्ति में जन्मजात या पारिवारिक विरासत में भी मिले हो सकते हैं  तथा समाज व संस्कृति के प्रभाव से स्वतः भी उत्पन्न हो सकते हैं  ।व्यक्ति का विनम्र व्यवहार उसे दयालु ,उदार और परोपकारी बनाता है  । विनम्रता का महत्व वही व्यक्ति समझ सकता है जो अहंकार विहीन हो क्योंकि अहंकारी व्यक्ति आतमहित का सदैव पक्षधर होता है  ।वह समाज के लिए अनुपयोगी ही रहता है । अहंकार सदा दूसरों की निंदा, आलोचना ,बुराई करवाता है ।प्रतिशोध की भावना पनपती है ।बुद्धि को कुंठित कर देता है  ।व्यक्तित्व को संदेह युक्त बना देता है । इसके विपरीत विनम्र व्यक्ति सह-अस्तित्व के साथ आगे बढ़ता है  ।विनम्रता व्यक्ति में श्रेष्ठ गुणों का विकास करती  हैं  उसे  शिष्ट बनाती  हैं वह शिष्टता ,सौहार्द और शालीनता अपनाता हुआ अच्छे व्यवहार का समाज में उदाहरण प्रस्तुत करता है  । विनम्रता व्यक्ति में सहनशीलता और धैर्य जैसे गुणों का भी विकास करती  हैं  ।सहनशील व्यक्ति सहजता से दूसरों की बात सुनता है तथा प्रतिक्रिया करता है ।धैर्यशील व्यक्ति क्रोध को अपने वश में कर लेता है तथा किसी विषय पर बिना सोचे अपनी तत्परता नहीं दिखाता  ।विनम्रता का भाव यदि ह्रदय से जुड़ा है तो इसके प्रति पूर्ण समर्पित आस्था बहुत जरूरी है  ।विनम्र भाव दिखाने के पीछे दिखावा नहीं होना चाहिए  ।बनावटीपन नहीं होना चाहिए  ।केवल अभिनय करके हम किसी की सहानुभूति यदि प्राप्त करते हैं तो वह दीर्घ जीवी नहीं होती शीघ्र ही टूट जाती है । विनम्रता को हास परिहास की छाया से भी दूर रखना चाहिए ।अहितकारी भावना इसका स्वरूप बिगाड़ देती है । आति विनम्र  होना व्यक्ति के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है ।उसके अधिकारों का हनन हो सकता है ।चापलूस व्यक्ति अपने मतलब के लिए उसका दुरुपयोग कर सकता है । शक्तिशाली लोग किसी विनम्र को भ्रम वश यह भी मान लेते हैं कि अमुक व्यक्ति हमारी शक्ति से डर कर ही विनय प्रदर्शन कर रहा है । इसलिए विनम्रता के साथ समय ,स्थिति और वातावरण अनुकूल संबंधित विषय के प्रति सही परख ,तजुर्बा ,अनुभव का होना अति आवश्यक है  । भले ही विनम्रता श्रेष्ठ सभ्य गुण है लेकिन उसके आत्म बल में उर्जा का अनवरत संचार आवश्यक है । अंत में यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि विनम्र होने का अभिप्राय दीन  हीन होना भी नहीं है वास्तव में विनम्र व्यक्ति को मानसिक ,आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से ज्यादा वरिष्ठ व मजबूत होने की जरूरत है । अतः विनम्रता व्यक्ति के व्यवहार और स्वभाव की एक संभव विशेषता है जो मृदुलता का आवरण ओढ़े हुए होती है ।


शीला सिंह 

बिलासपुर 

हिमाचल प्रदेश🙏

, जय माता दी

 🙏 मां चंद्रघंटा  🙏


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नवशक्ति में रूप तीसरा 

अति   कल्याणकारी  । 

दिव्या   सुगंधि    पूर्ण 

सिंह    की    सवारी।  ।


मस्तक   पर   अर्धचंद्र 

चंद्रघंटा     कहलाती  ।

कनक सम  तन रंगत

है चमक   मन  भाती ।


दशम   हस्त    खडग

अस्त्र शस्त्र   सजे   हैं   ।

ध्वनि  भयानक  करती 

दानव  दैत्य  कांपे   हैं  ।


 भक्ति  कर   साधक

 निर्भय वीर  बने  है   । 

ज्ञान सौम्या विनम्रता 

की  ज्योत  जगे  हैं  ।


 हे  कष्टहारिणी   मैं  

शरणागत  कृपा करो ।

शुचि विग्रह ध्यान करूं

 ऐसा   वरदान   दो    ।


लोक परलोक  सद्गति

 दो  मुझे   हे   देवी    ।

मन क्रम वचन करूं 

आराधना मैं हे देवी। ।



 शीला सिंह 

बिलासपुर ।

हि. प्र. ।

Saturday, October 17, 2020

जय माता दी

 🙏जय माता दी🙏


नवशक्ति में दूसरा रूप  मां बड़ा ही प्रतापी है ।

जो तप, वैराग्य ,सदाचार, संयम और त्यागी है ।


धैर्य ,तप की चारिणी, तू ब्रह्मा चरिणी है  ।

पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य भाविनी है ।


नारद के उपदेश से शंकर को पति रूप माना ।

कठिन तप सहस्त्र  वर्षों ,अपर्णा नाम जाना ।


विलव पत्र सेवनी केवल आराधना शंकर माना ।

तू  ही  निर्जला और   निराहरिणी जग ने माना ।


देव जन ऋषि मुनि सराहना तेरी करते हैं ।

चंद्रमौली   शिव  मिले  तुम्हें  ये वरदान देते हैं ।


तुम्हारी पूजा से सर्व सिद्धि सब जन पाते हैं ।

जीवन है कठिन तप कथा का सार बताते हैं। 


 शीला सिंह 

बिलासपुर

(हि. प्र.)

Friday, October 16, 2020

जय माता दी

 🙏जय माता दी 🙏

शारदीय नवरात्र पर सभी को बहुत-बहुत बधाई 🌹🌹

आए शुभ शारदीय नवरात्र मां  की  कृपा  पाने  को ।

नौ दिवस अर्चना, नौ देवी उत्सुक  दर्शन  पाने  को ।


प्रातः मुहूर्त ब्रह्म कर स्नान, संकल्प  करूं पूजन को ।

मिट्टी की बेदी बनाऊ ,जोै और गेहूं मिलाऊ बोने को।


धरती बंदना, विधि पूजन फिर कलश स्थापन  को।

प्रथम पूज्य मेरे गणपति कथ  वैदिक  मंत्रों को ।


लाल बिछाऊ आसन ,

रखूं मां  की प्रतिमा को ।

कुंकुम ,चावल , पुष्प   इत्र पूजन सब विधि विधान को


प्रथम रूप ,पर्वत की बेटी दक्ष कन्या शैलपुत्री को ।

बाएं हाथ कमल का फूल त्रिशूल सजे है दाहिने को।


अर्थ चंद्र माथ सोैहे , देखूं मैं अनुपम सुंदर छटा को नंदी बैलपर सवार चली मां जग का कल्याण करने को


🙏🙏🙏🙏🙏

शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल  प्रदेश।

अस्तित्व मेरा

 16 अक्टूबर 2020

' अस्तित्व मेरा '

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 मेरी वाे बचपन की तस्वीर मैं जिस से बातें करती हूं ।


निहारु जिसे बार-बार मैं पहुंच बचपन मेंजाती हूं।


करके सुंदर पलों को याद

मन ही  मन  हर्षाती  हूं ।


कभी झूमती मस्ती में गाना गाती  गुनगुनाती  हूं ।


 पापा कैसे घोड़ा बनते पीठ पर मुझे बिठाते थे।


 करती अठखेलियां खेल-खेल में नाच नचाते थे।


 मां खाने की थाली लेकर पीछे पीछे भागती थी ।


 सौ साै नखरे सहती  कभी गुस्सा नहीं जताती थी ।


 भैया दीदी सबकी प्यारी सभी लाड लड़ाते  थे।


 रूठ जाऊं झूठ मूठ ही झट सभी मनाते   थे ।


आज सोचू इतनी जल्दी मैं  क्यों  बड़ी  हो  गई ।


 निज  बंधुओं के संग रहने वाली क्यों अकेली हाे गई।


तब हुकम चलाती थी सब पर  राज  करती  थी ।


 मानती अग्रणी ,तब मर्जी अपनी  ही चलाती थी ।


आज मैं कितनी गाैण हूं? माैन मेरी मर्यादा है ।


कोई उमंग न तरंग  जीवन सीधा  साधा   है।


 लाड.पीहर में मिलता यहां तो संस्कारों का घेरा है ।


 उस घर के लिए' पराया धन ये भी कहा मेरा है ???


शीला सिंह 

बिलासपुर 

हिमाचल प्रदेश 🙏

वीर सैनिकों को शत-शत प्रणाम

 'वीर सैनिक तुझे शत-शत           

         नमन '

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 तुझ पे क्या मैं लिखूं ए सैनिक,

तू शब्दों का मोहताज नहीं है।

सूर्य चंद्रमा और सितारे

 तेरे साक्षी ,

सभी ने कहानी यही कही है ।


 सोता सारा जग चैन निंद्रा क्योंकि ,

सीमा पर प्रहरी जाग रहा

 है ।

सांसे रोके चैतन्या भाव से  कर्तव्य-

हित भाग रहा है ।


 दिवस  रात्रि सब एक समान ,

चतुरदृष्टि कण-कण

धारणी आसमान ।


चाहे चमके प्रचंड दिवाकर चाहे 

बरसे हिम पत्थर गोले।


लक्ष्य केवल सर्वोपरि,

 हाथ सुशोभित सदा थामे कमान।


 एक दिन ऐसा आया ,जब पड़ी कान में 

 दुश्मन की ललकार ।


 भारत मां की रक्षा करने निकल 

पड़ा वो वीर भर के हुंकार।


 रणभूमि पर खड़ा हुआ जब सीना तान 

शत्रु ने किया पीठ फिर पर वार।



न सहमा हदय न हारी हिम्मत 

जूझ गया वो सैन्य करतार 



 भिड़ गया मां का लाल, अकेला वह,

शत्रु संख्या में थे चार ।


 एक एक को चुन चुन 

कर मारा 

जब तक रही उसकी जान में जान ।


 शहीद होने का एहसास उपजा 

तो सैनिक स्वंय से कहने लगा ।


 हे भारत मां तुम्हारी ममता भरी गोद 

में चिर निद्रा में मैं सोने लगा।


वीर जवानों की शहादत पर 

गूंज उठा जब भारतवर्ष सारा


 तिरंगे में लिपट देख वीर सपूत को

 बिलखा गांव शहर सारा।


 भारत मां पर न्योछावर होकर

 अमर गाथा रच गया वह ।


 रक्षा करते करते देश की अपनी 

वीर कहानी कह गया वह।


 गर्व से सीना फूला पिता का

 मां की ममता बिखरी गगन में।


 दामन में उतरा दूध बेटे की अर्थी देख 

बाैराई बेसुध पड़ी आंगन में।


 उस बाला की पीड़ा कह न सके 

गीली मेहंदी हाथों को छुपा रही थी।


 काजल छूटा आंखों से बिछड़ 

गया प्रियतम ,देह कंपकंपा रही थी ।


 बहन सिसकती देख भाई को ,

अब राखी किसे मैं 

पहनाऊंगी ।


 रक्षाबंधन पर तिलक की थाली 

अब मैं कैसे सजाऊंगी।


 जोश में बोले पिता राष्ट्र- प्रेम की धुन

निराली, दिल में जलाउगा 


 दुश्मन का सीना करूंगा छलनी

 मैं भी बंदूक उठांउगा ।


 ऋण मां भारती का चुकाने ,

पोते को भी सैनिक बनाऊंगा ।


 लुट गया उसका सब 

कुछ ,

चला गया बुढ़ापे का सहारा ।


वाह रे राष्ट्र- हितैषी तेरी हिम्मत 

को नमन करे जग 

सारा  ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏

कोरोना सबको सीख ले गया

 16 अक्टूबर 2020

' कोरोना सबको सीख दे दिया'

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कोरोना आया जो दे गया सीख हम सभी को ।

बन गए अत्याधुनिक भूल थे अपनी संस्कृति को।


याद करो जब दादी ब्रह्म मुहूर्त मैं उठा करती थी ।

फिर   सब    को   जगाने, आवाज लगाया करती थी।


स्नान करके सुंदर भजन गुनगुनाया करती थी।

धूप की सुगंध फैलती ,घंटी ताल में बजती थी ।


सीताराम राधेश्याम आरती पूरे घर में गूंजती थी।

शुद्धि हेतु  पूरे  घर  में गंगाजल छिड़कती थी।


प्रसाद की थाली हर सदस्य के आगे घूमती थी ।


मां भी खूब दादी कीआज्ञा का पालन करती थी ।

कहीं विसर न जाए अपनी संस्कृति वह डरती थी ।


झाड़ू पोछा  पवित्र  स्नान फिर चूल्हाचौका करतीथी।

सूर्यउदय से पहले सभी को स्नान करने की परंपरा थी।


प्रथम भोग प्रभु को लगता फिर सभी को अनुमतिथी।


वाह रे करोना पुराने दिनों की याद करा गया।

सोए थे चिर निंद्रा में तू सब को जगा गया ।


 उन नियमों और संस्कारों को सबको थमा गया ।

 घर परिवार देश की चिंता का पाठ सिखा गया।


चिंता आज अपनी  नहीं पूरी मानवता हम से जुड़ीहै

हर प्राण की डगर ना जाने किस दिशा में मुड़ी है।


 कुछ दिन की दूरियां पर दिल में सब का वास है ।

पूर्ण   स्वस्थ   निरोगी    हर जनमानस की तीव्र आस है 


 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏

घमंड अज्ञान की उपज

 यह कथन बिल्कुल सही है कि  'घमंड का अंकुर अज्ञान से ही फूटता है ।'


 घमंड वह अंहकारी भाव है  ,जो किसी व्यक्ति द्वारा अपनी  किसी वस्तु ,संपदा, प्रतिभा ,गुण पर रोबदार प्रदर्शन , जो अंह से भरपूर होता है ,घमंड कहलाता है। 

घमंड तुच्छ, घृणित एवं नकारात्मक सोच का परिणाम है जिसके मूल में अज्ञानता की बहुलता होती है । 

व्यक्ति अपने आप को औरों से बहुत अधिक योग्य , समर्थ , सक्षम ताकतवर या बढ़कर  समझने लगता है ।बनावटी ओछा प्रदर्शन करता है । अपनी बढ़ाई स्वयं ही करता है । आत्म प्रशंसा का भूखा होता है । दूसरों की प्रशंसा सहन न करके केवल अपनी ही प्रसिद्धि बिखेरने का पक्षधर होता है ।

 घमंड एक बुराई है जिसे अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है । सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठता दर्शाते हुए जाति का घमंड ,आर्थिक स्तर पर उच्चता दर्शाते हुए पैसा, धन का ,संपत्ति का घमंड । गुण, प्रतिभा की महानता दर्शाते हुए ज्ञान का घमंड । नश्वर शारीरिक सौंदर्य पर घमंड । 

घमंड किसी भी प्रकार का हो उसका मूल अज्ञानता ही है । अज्ञानी व्यक्ति समाज को भेदभाव में बांटता है ,धन के नशे में चूर व्यक्ति दिशाहीन होकर अमर्यादित जीवन जीता है । अपने ज्ञान पर घमंड करने वाला व्यक्ति सदैव नकारात्मक सोच में ही घिरा रहता है । ज्ञानी होते हुए भी अज्ञान के अंधकार में डूबा रहता है ।


घमंड व्यक्ति को सामाजिकता के महत्व से अनभिज्ञ रखता है। घमंड भाईचारे का दुश्मन है  ।अज्ञानता वश अनमोल रिश्तो  के सानिध्य से वंचित रह जाता है  । अतः  आत्म सुधार  नीति को अपना कर ,श्रेयकर जानते हुए  अपनी अज्ञानता की सीमा को भी जानना जरूरी है और वही सच्चा ज्ञान है ।


 शीला सिंह 

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश।🙏

Tuesday, October 13, 2020

अमूल्य मानव जीवन

 मानव जीवन अमूल्य है। यह ईश्वर का दिया हुआ अनमोल तोहफा है  ।


।जीवन को सामर्थ्यवान बनाकर इसकी पूर्णता को ग्रहण किया जा सकता है । मनुष्य सदैव योग्य और सफल जीवन की कामना करता है । इसके लिए वह श्रेष्ठ कर्म और परिश्रम को महत्व देता है । जीवन को प्रगति के पथ पर गतिमान बनाए रखने के लिए  योग्यता  ,कर्मठता ,मेहनत जैसे गुणों का होना अति आवश्यक है। 


 जीवन में निरंतर आगे बढ़ने की लालसा , और सब कुछ पाने की इच्छा  मनुष्य में गतिशीलता का प्रवाह बनाए रखती है । जीवन में सफलता का प्रवाह अथवा बहाव झरने के स्रोत की भांति  उत्तरोत्तर उन्नति का परिचायक तो है ही मगर कुछ मानवीय मूल्यों से अलग  ।

 मनुष्य का मानसिक चिंतन केवल आत्म उन्नति और सफलता तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए उसे मानवीय परिवेश  से परिचित होना भी आवश्यक है ।

 मनुष्य सफल  जीवन की सदैव कल्पना करता है उसका हमेशा पक्षधर रहता है । मगर तरक्की के प्रवाह में इतना बह जाता है कि सभी मानव मूल्यों की उपेक्षा करता जाता है ।

  किसी हद तक जीवन का बहाव झरने जैसा होना चाहिए क्योंकि सागर तक पहुंचने के लिए यह प्रवाह अति आवश्यक है । परंतु वहां तक पहुंचते-पहुंचते  झरना अपनी पहचान और अपना अस्तित्व ही खत्म कर देता है । उसकी अलग से कोई पहचान नहीं रहती । वह विशाल समुद्र में अपने आप को समर्पित कर देता है , या यूं कहें कि वह अपनी गतिशीलता को विराम दे देता है  ।


  मानव जीवन में तरक्की का बहाव, आगे बढ़ने की होड़  कोई बुरी बात नहीं है मगर मानवीय मूल्यों का तिरस्कार  नहीं होना चाहिए। जीवन में विकास जरूरी है मगर उस की नींव  विनाश के पत्थर पर नहीं टिकी होनी चाहिए । जीवन में गतिशीलता जरूरी है मगर संवेदनहीनता नहीं होनी चाहिए । जीवन में आत्म विकास ,आत्माेत्थान सर्वोपरि है मगर मानव  विरोधी नहीं होना चाहिए, राष्ट्र  विरोधी नहीं होना चाहिये ।


 शीला  सिंह

 बिलासपुर ,हिमाचल प्रदेश।

Monday, October 12, 2020

प्रार्थना में शक्ति

 जी हां प्रार्थना मन की पुकार है जो भावपूर्ण हृदय से निकलती है, इसका व्यक्ति के  अवचेतन मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। किसी भी व्यक्ति/ भक्त का व्याकुल मन विनीत भाव में जब प्रभु के प्रति करुण पुकार करता है तो वह प्रार्थना अवश्य सफल होती है। प्रार्थना विश्वास का विधान है ।एक प्रेरक शक्ति है जो हमें विपरीत /कठिन /संकटमय परिस्थितियों से सामना करने की हिम्मत देती है। प्रार्थना से बड़ी सहायक शक्ति दूसरी नहीं है ।स्वास्थ्य को लेकर जब हम हताश हो जाते हैं तो उस परमपिता परमेश्वर के समक्ष विनय /प्रार्थना करते हैं जो सर्व व्यापक है, सर्वशक्तिमान है ,हम उसकी उपस्थिति अपने आसपास ही समझते हैं और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। संकट में घिर जाने पर भी हम उसी अज्ञात सत्ता का स्मरण करते हुए प्रार्थना करते हैं। सृष्टि के रचयिता जिस प्रभु द्वारा पूरी सृष्टि सजीव है, चलायमान है ,उसी असीम व अनंत सत्ता के प्रति जब हमारा मस्तक श्रद्धा भाव से झुक जाता है ,वह प्रार्थना है। प्रार्थना ही हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करती है। सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना अवश्य चमत्कारिक होती है ।वह सीधी परमात्मा तक पहुंचती है ।अतः अपने जीवन काल में मेरा यह अनुभव रहा है जब हम सारी आशा छोड़कर, हताश हो कर, निढाल हो कर, बैठ जाते हैं उस समय प्रभु के समक्ष जब   हृदय  की पुकार उठती है तो हमें कहीं न कहीं से अवश्य कोई सहारा या मदद मिल जाती है । अतः प्रार्थना सांसारिक और असांसारिक समस्याओं का समाधान है क्योंकि इसकी पुकार ह्रदय के माध्यम से होती है।


शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश।🙏

Sunday, October 11, 2020

सफलता से ज्यादा असफलता सिखाती है

 सफलता मानव जीवन का मूल मंत्र है । जीवन में सफलता पाने के लिए व्यक्ति निरंतर प्रयास करता है । दुर्भाग्यवश यदि असफलता का सामना करना पड़े तो मनुष्य का हृदय टूट जाता है , बिखर जाता है ,थोड़ी देर के लिए ही सही अपने आप को असहाय महसूस करने लगता है । असफलता भयंकर अंधेरे की भांति लगती है । 

लेकिने बहुत से ऐसे उदाहरण है जहां असफलता या ठोकर लगने के बाद  सफलता की चरम सीमा को ग्रहण किया गया है । व्यक्ति के लिए असफलता बहुत बड़ी सीख है , जो उसे आगे बढ़ने की हिम्मत भी देती है और  ठोकर से खाए हुए जख्मों पर मरहम लगाने की दवा भी देती है।


  अंग्रेजी में एक कहावत है 'स्ट्रगल एंड शाइन' यह कहावत हमें बड़ी शक्ति देती है  ,जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है । हमारे जीवन में कठिनाइयां तो आती है और कभी-कभी इतनी अप्रत्याशित कि संभलने का भी हमें समय नहीं मिलता लेकिन जीवन में ठोकर खाकर हम संभलना सीख जाते हैं ।


 मुश्किलों से ना घबराकर उनका सामना करना सीख जाते हैं  ,एक नया निखार हमारे जीवन में आ जाता है । रसायन शास्त्र का एक नियम हमने पढ़ा है  जो जिंदगी पर भी लागू होता है कि -'जब कोई अणु टूट कर पुनः अपने पूर्व अवस्था में आता है तो वह पहले से भी अधिक मजबूत होता है  ।'इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में परेशानियां तो आएंगे ही लेकिन उन परेशानियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए ताकि हमें और मजबूती मिले जीवन में तरक्की के रास्ते खुल जाएं ।

" मुश्किलें ही संवारती है जीवन को, मुश्किलों के बिना जीवन में कांति  कहां"

 अतः जीवन की विफलताओं से हम बहुत कुछ सीखते हैं ।  औरों की सफलता को देखकर हमें अपने हृदय को ईर्ष्या और द्वेष का भंडार नहीं बनाना चाहिए बल्कि उससे शिक्षा लेनी  चाहिए । दूसरों के सभ्य  जीवन से सीख लेकर आत्माेत्थान की भावना होनी चाहिए ।


 अच्छे गुणों को आत्मसात करके, सफलता को ग्रहण करके हमारा जीवन औरों के लिए भी प्रेरणा बनना चाहिए । 

इस विषय को लेकर मेरा यह कथन है कि  'जीवन वही सफल है जो हर दिशा से मोती रूपी गुण एकत्रित करके अपने जीवन को सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाता है ।'


 शीला सिंह 

बिलासपुर

 हिमाचल प्रदेश ।🙏

Saturday, October 10, 2020

क्रोध एक विकृति

 गुस्सा अथवा क्रोध मानव के लिए हानिकारक है ।यह किसी भी व्यक्ति की कायरता को दर्शाता है  और धैर्य हीनता का सूचक है। 


परिस्थितियों से सामना न कर पाना , उनके अनुरूप स्वयं को न ढाल पाना, सहनशीलता और धैर्य की कमी का होना, सनकीपन, हीन भावना  जैसे बुरे भाव मनुष्य में  क्रोधी प्रवृत्तियां पैदा करते हैं ।


 क्रोध का आवरण मनुष्य की तार्किक मानसिक दशा को भ्रष्ट कर देता है ।  व्यक्ति सही गलत का निर्णय नहीं ले पाता । वह अवसाद का शिकार हो जाता है अपना शत्रु स्वयं बन जाता है अपनी ही जीवन लीला समाप्त करने के मौके ढूंढता है  आैर अंतत: इस परिणाम तक पहुंच भी जाता है ।


 यह सब क्रोध और निराशा का मिश्रण ही है । क्रोध अथवा गुस्सा भले ही कुछ पल का होता है मगर उसके परिणाम भयानक ही होते हैं । व्यक्ति आत्महत्या करने जैसे दुखद कदम भी तभी उठाता है जब वह एकाकी  अर्थात अकेला जीवन यापन कर रहा हो, परिवार से वंचित हो, समाज से बहिष्कृत हो  , तिरस्कृत हो, अवसाद में घिरा हुआ हो ,हर तरफ निराशा ही निराशा हो और  मन मस्तिष्क में क्रोध का वास हो जाए ।


 वह क्षणिक क्रोधित पल व्यक्ति के लिए अत्यंत घातक होता है , जब वह स्वंय को ही खत्म कर लेता है । आज वर्तमान परिस्थितियां ऐसी बन चुकी है कि मनुष्य क्रोध, निराशा और अवसाद में घिरा हुआ है और आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है । 


अतः आज जरूरत है श्रेष्ठ जीवन सिद्धांतों  की ,उच्च जीवन शास्त्र नियमों को अपनाने की , शुद्ध आचरण अपनाने की, पारिवारिक संयुक्तता  के महत्व को जानने की  तथा मानव मात्र के हृदय में  प्रेम , स्नेह की ज्योति जगाने की।


शीला सिंह 

बिलासपुर,

 हिमाचल प्रदेश ।🙏

Friday, October 9, 2020

विचार

 " विचार "

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 जीवन का आधार विचार है ,विचार हमारे मन और मस्तिष्क के संयोजन का परिणाम है  ।मन और मस्तिष्क का यह अनोखा संबंध है जो केवल मनुष्य में ही पाया जाता है  । सोचने के लिए समझने के लिए एक विकसित मस्तिष्क की आवश्यकता होती है ,जो 

 समस्त  जीव धारियों के अपेक्षा  केवल  मनुष्य में ही पाया जाता है  मानव जीवन  विचारों के साथ  आरंभ होता है और विचारों के साथ खत्म होता है कभी शून्य पर आरंभ तो कभी शून्य पर समाप्त । जीवन का आरंभ और अंत दोनों ही विचारों पर निर्भर करता है ।मानव जीवन में विचारों का यह सिलसिला चलता रहता है ।जगती विचारों से ही जिंदा है ।विचार हमारी समझ वह हमारे ज्ञान के परिचायक हैं ।विचार ही है जो व्यक्ति को महान बनाते हैं और महान कार्यों के प्रति रुझान बढ़ाते हैं 

 अच्छे विचार घर परिवार कार्य व्यापार समाज में मनुष्य को प्रगति की ओर ले जाते हैं ।सफलता विचारों पर ही निर्भर करती है  ।विचार परस्पर संबंधों को जोड़ने की कड़ी का काम करते हैं  ।विचार हमारे संबंधों को सींचने वाला अमृत है  ।

विचार परिवर्तनशील होते हैं जो परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं ।हर परिस्थिति में विचारों में भिन्नता पाई जाती है स्वीकार्य परिस्थितियों में विचारों में प्रेम, दया ,ममता आदि गुणों का समावेश हो जाता है ।विचार संस्कार बन जाते हैं मनुष्य आदरणीय सम्माननीय बन जाता है ।विचारों ने प्रेम का रूप धारण किया तो कभी इसके विपरीत भी ।व्यक्ति की सफलता एवं असफलता उसके सकारात्मक एवं नकारात्मक विचारों पर निर्भर करती है। उच्च विचार जहां हमारी  प्रगति उन्नति के आधार हैं वही तुछ  विचार व्यक्ति के जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं ।विचार व्यक्ति के अस्तित्व की पहचान है ।अतः वैचारिक निरंतरता से ही जीवन चलायमान है । व्यक्ति के जीवन में घटित घटनाएं भी विचारों को जन्म देती हैं ।हृदय में उत्पन्न सुख भाव या दुख भाव ही विचारों की प्रतीति है । किसी के द्वारा दिया  कस्ट ,धोखा ,दुख व्यक्ति में  विरोधी विचार ,भाव पैदा करता है वहीं खुशी ,सुख ,अनुकूल परिस्थितियां सकारात्मक विचारों को जन्म देती है। यहां भावों में बंधा हुआ विचारों का ही सिलसिला है विचार स्वभाव है प्रवृत्ति है मानव प्रकृति है समय घटना और परिस्थिति अनुरूप रंग बदलते भावों का नाम ही विचार है विचार जब किसी विशेष वैचारिक प्रवाह की धारा में बहते हैं तो विचारधारा कहलाते हैं सत्संग में बैठा हुआ व्यक्ति भक्तिमय विचारों को आत्मसात करता है ,उसे चारों ओर ईश्वरीय शक्ति के दर्शन होते हैं मानव मात्र में प्रभु का निवास मानता है आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है, इन्हें सात्विक विचार कहते हैं ।सकारात्मक सोच इन विचारों का आधार बन जाता है ।यही विचार व्यक्ति  की  आत्म  प्रगति में  सहायक बनते हैं और जीवन शैली में परिवर्तन लाते हैं।सफल,  योग्य ,महात्मा व उच्च पद पर आसींन व्यक्ति के जीवन परिचय /चरित्र को पढ़कर व्यक्ति के मन में उत्साह ,जोश ,कुछ अच्छा करने ,अच्छा बनने ,प्रगति ,उन्नति का भाव पैदा होता है, ऐसे प्रगतिशील उत्साह पूर्ण विचार व्यक्ति को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं ,सफलता के शिखर तक पहुंचाते हैं। ऐसे विचारों से युक्त जीवन शैली औरों के लिए प्रेरणादाई सिद्ध होती है। जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है की मस्तिष्क में किस प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं । भारतीय संस्कृति में ऋषि-मुनियों ,महात्माओं ,सिद्ध पुरुषों के सुंदर प्रेरणादाई विचारों के दर्शन होते हैं ,जो मनुष्य के सफल जीवन जीने के लिए उपयोगी माने गए हैं । जीवन की परिभाषा उपयोगी ,सहयोगी एवं अर्थपूर्ण विचारों से जुड़ी है अतः व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती हैकि उसके मन मस्तिष्क में किस प्रकार के विचारों का संग्रह है । धन्यवाद ।

Thursday, October 8, 2020

सांसारिक सुखों का परिणाम दुख

 मानव जीवन में आज तक सांसारिक सुखों की खोज  कभी पूरी नहीं हो पाई  ।सुखी जीवन  अथवा जीवन में खुशी पाने के लिए व्यक्ति  प्रयास करता रहा है 

 ।सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं  जो हमारे कर्मों के परिणाम स्वरूप हमें मिलते हैं ।

 सांसारिक खुशी भौतिक या मानसिक दो  स्वरूप में देखी जा सकती है ।

 भौतिक सुख साधनों की कमी भी दुख का कारण बनती है  । अपेक्षाओं से अधिक इच्छाओं का पालना भी दुख का कारण बनता है । 

 व्यक्ति जब अपनी मेहनत से सुखाें का भंडार संजोता है तो आत्म संतुष्टि का अनुभव करता है  ।विरासत में मिला हुआ जीवन का सुख  मनुष्य को   श्रम हीन, कृतज्ञहीन बना देता है क्योंकि वह उस श्रमभाव से अपरिचित रहता है ।  दुर्भाग्यवश जब उन सुख साधनों में कमी आ जाती है तो  मनुष्य अपने आप को दीन -हीन और दुखी समझने लगता है  ।भोगा हुआ सांसारिक सुख, दुख में परिवर्तित हो जाता है । 

किसी कार्य के प्रति कर्मठता, लगन और ईमानदारी सफल परिणाम देती है ,  सुख की अनुभूति प्रदान करती है  ।

जीवन में कुछ अच्छा करने का भाव खुशी प्रदान करता है ।  कोई भी श्रेष्ठ ,भला कर्म, परोपकार की भावना से युक्त किया गया करम , हमें खुशी प्रदान करता है । क्योंकि इसके पीछे स्करात्मक सोच भी होती है । हर विपरीत अथवा बुरा व्यवहार या कर्म के पीछे मनुष्य की नकारात्मक और हीन भावना कार्य करती है । माेह से घिरा व्यक्ति भी अपने जीवन में दुख के बीज स्वयं बोता है । परिवारिक माेह ,संतान मोह व्यक्ति के लिए सुखकर तो होते हैं  ,परंतु अंततः  जब उपेक्षा का भाव मुखर हो जाता है तो दुखों की उत्पत्ति करता है । यह मानना सही है कि सांसारिक सुखों का परिणाम दुख ही है लेकिन स्थिरता ,संतोष ,धैर्य जैसे गुणों के आधार पर विपरीत परिस्थितियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है । 

कहा भी गया है  'संसार दुखों का घर है '। मगर गृहस्थ जीवन अपनाते हुए संसार को छोड़ा भी नहीं जा सकता । जरूरत है  जीवन में कुछ आदर्शों ,सिद्धांतों को अपनाने की।  सुख-दुख को समभाव मानने की । 


 शीला सिंह 

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

🙏

Wednesday, October 7, 2020

मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा

 मातृ भाषा अर्थात मां की भाषा जिससे प्रत्येक बच्चे का लगाव और स्नेह जुड़ा होता है ।

मां अपने बच्चे को कभी इशारों से तो कभी तोतली भाषा में सिखाने का प्रयास करती है।

 जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वह अपनी मातृभाषा को पूरी तरह से सीख जाता है ,हर बात आसानी से समझ लेता है , विचारों को व्यक्त कर लेता है ।

 बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा यदि मातृभाषा में हो तो वह बहुत सहजता से सीख पाएगा।

 मां उसकी प्रथम गुरु तथा परिवार प्रथम पाठशाला होती है  ,मातृभाषा से बच्चा परिचित होता है उसे समझने में और ग्रहण करने में सफलता मिलती है ।


 घर परिवार में जिस भाषा में बातचीत करते हैं वही भाषा बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा के लिए लाभप्रद मानी जाती है ।

 इसके अलावा मातृ भाषा हमारी संस्कृति को पुष्ट भी करती है और संस्कारों की नींव भी मजबूत करती है  ।


अपनी बाेल चाल में दिए गए संस्कार , सीख बच्चे शीघ्र आत्मसात करते हैं । 


परिवार में बड़े बूढ़ों का अच्छा व्यवहार , सकारात्मक सोच श्रेष्ठ विचारों को जन्म देते हैं । 


इन सब का आधार मातृभाषा ही होती है ।


 अतः प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए क्योंकि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा का उसके जीवन में विशेष स्थान है , यह उसकी विशेष अवस्था है  जब वह शिक्षा की  सीढ़ी के प्रथम पायदान पर अपना कदम रखने जा रहा होता है ।


 शिक्षा का आगामी क्रम यहीं से शुरू होता है । शिक्षा क्षेत्र की पृष्ठभूमि को मातृभाषा बल प्रदान करती हैं । 

पाठशालाओं में ,शिक्षण संस्थाओं में, शिक्षा का माध्यम चाहे हिंदी हो या अंग्रेजी  विद्यार्थी का आधार मजबूत होना चाहिए ।

 इसीलिए अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा का विशेष महत्त्व है। समय के वेग में ढलने हेतु अन्य भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी है । उच्च शिक्षा प्राप्ति में अंग्रेजी भाषा का अपना महत्व है । लेकिन उसमें भी विद्यार्थी पारंगत तभी होगा जब उसका मूल आधार बलिष्ठ होगा।  इसके लिए मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा अति आवश्यक है  ।


 शीला सिंह

 बिलासपुर 

हिमाचल प्रदेश ।🙏

Tuesday, October 6, 2020

शिक्षा का महत्व

 मानव जीवन में शिक्षा का विशेष महत्व है ।  सर्वप्रथम शिक्षा शब्द पर जानकारी जरूरी है ।


 शिक्षा शब्द संस्कृत भाषा के 'शिक्ष' धातु से बना है , जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना  ।शिक्षा शब्द का अंग्रेजी समानार्थक शब्द एजुकेशन (Education) जो लैटिन भाषा के एडूकेट्म(Educatum) शब्द से बना है एडकेटम  शब्द का अर्थ है शिक्षण कार्य  ।


कुछ विद्वानों के अनुसार एजुकेशन Education शब्द की उत्पत्ति एडुकेयर (Educare) से हुई है जिसका अर्थ है विकसित करना ।


 शिक्षा का रूप -आकार अति विस्तृत है । यह एक ऐसा साधन है जो मानव को प्राणी जगत के अन्य जीवों से पृथक करता है ।


 शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है शिक्षा मानव को एक सामाजिक प्राणी बनाकर सांस्कृतिक धरोहर को आगे आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने के योग्य बनाती है  । 


शिक्षा से ही मनुष्य का सर्वांगीण विकास होता है मानव अपना व्यक्तित्व जीवन सुखमय बनाता है 


 ।  शिक्षा समाज की उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण साधन है ।

 

 लेकिन शिक्षा ग्रहण करने का माध्यम केवल किताबें ही नहीं होनी चाहिए, हर वह जानकारी जो अलग-अलग परिवेश ,तरीके से प्राप्त होती है उसका भी विशेष महत्व है। शिक्षा के अंतर्गत अच्छे गुण अच्छे संस्कार निहित होते हैं ।


 किताबी ज्ञान के बल पर व्यक्ति शिक्षित अवश्य होता है परंतु यदि वह अपने आसपास के वातावरण, घटनाओं, प्रसंगो से अनभिज्ञ है, तो वह शिक्षित होते हुए भी अशिक्षित हैं।  

किसी विषय पर जानकारी शिक्षा हो सकती है यदि उसका सदुपयोग किया जाए । शिक्षा का उद्देश्य सीमित नहीं होना चाहिए। किसी भी जानकारी को  घेरे में बंद करके नहीं रखना चाहिए  ।यदि हमें किसी विषय पर जानकारी है  तो उसका सदुपयोग करते हुए उसके विकास पर गतिमान होना चाहिए ।

  

एक योग्य चिकित्सक की चिकित्सा शास्त्र में जानकारी तब तक योग्य नहीं मानी जाएगी जब तक उसका उपयोगी कदम मानवीय सेवा में नहीं बढ़ाया जाता ।  शिक्षित व्यक्ति की अपेक्षा एक अनपढ़ व्यक्ति की जानकारी समय स्थिति अनुकूल बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है । वह भले ही अनपढ़ है परंतु ज्ञानी है वह ज्ञान ही उसकी शिक्षा है । यही ज्ञान उसके हृदय में परोपकार की भावना पैदा करता है । मानव मात्र के प्रति संवेदना बढ़ाता है।


 । अतः शिक्षा के माध्यम से ग्रहण की गई जानकारी तब तक महत्वहीन है जब तक वह विकासशील नहीं है , जब तक वह उपयोगी , सदुपयोगी नहीं है ।  जानकारी जो मानव मात्र के कल्याणर्थ  हाे वही असली शिक्षा है ।


 शीला सिंह

 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश ।🙏

Monday, October 5, 2020

विचार और भाव

 विचार हमारे मन और मस्तिष्क के संयोजन का परिणाम है । मानव जीवन विचारों के साथ आरंभ होता है और विचारों के साथ खत्म होता है  ।मानव जीवन में विचारों का यह सिलसिला चलता रहता है ।

 विचार हमारे समाज व हमारे ज्ञान के परिचायक हैं । विचार मनुष्य के जीवन में परिवर्तन लाते हैं । विचार भाव में परिवर्तित होकर स्थिरता ग्रहण करते हैं । भाव एक संपूर्ण अंगिक  घटना है जो हमारे पूरे अस्तित्व में अपना प्रभाव दिखाती है । विचार घटना, परिस्थिति, समय के अनुरूप बदल जाते हैं लेकिन भाव तटस्थ बने रहते हैं भाव भावना में बदल जाते हैं।  किसी के प्रति कल्याणकारी भावना दिखाना, किसी के सुख दुख में काम आना ,दुख के समय किसी की सहायता करना ये हमारे परोपकारी भाव है । भगवान के मंदिर में खड़ा हुआ व्यक्ति पूजा अर्चना में व्यस्त , भक्ति भावना से ओतप्रोत हो जाता है , यह भावना  ईश्वरीय  भाव है। थोड़ी देर के लिए हम विचार करते हैं कि यह संसार नश्वर है हम भगवान के प्रति आस्था दिखाते हुए आस्तिक भाव को अपनाते हैं । इन भावों में निरंतरता हमारी भावना बन जाती है ।  विचार ही भावों को जन्म देते हैं । विचार अप्रत्यक्ष भी हो सकते हैं लेकिन भाव हमारे व्यवहार से प्रदर्शित हो जाते हैं  किसी को दुख में देखकर दुखी होना प्रसन्नता के समय खुशियां व्यक्त करना ही भाव है। अतः विचार एक आंशिक घटना है , जो हमारे मस्तिष्क में चलती हैं और भाव एक सर्वांग घटना है , जो हमारे पूरे अस्तित्व से मैं गूंज जाती है ।


 शीला सिंह,

 बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश ।

वक्त

 वक्त अर्थात समय अति मूल्यवान है । वक्त का हमारे जीवन में विशेष महत्व है ।


 समय और परिस्थिति के अनुकूल वक्त का सदुपयोग हमारे जीवन काे सुखमय बनाता है । 


मेहनत और लगन से वक्त की धारा को मोड़ा जा सकता है । जिन्होंने वक्त की कद्र की  उन्हें राजा बनते हुए भी देखा है और जिन्होंने वक्त की बर्बादी  की वो रंक भी बने हैं ।


 वक्त बड़ा बलवान है । वक्त रहते यदि कोई संभल गया तो उसने अपना जीवन संवार लिया। वक्त कभी रुकता नहीं इसकी दिशा  सीधी आगे की ओर बढ़ती है ।


 वक्त को भाग्य से भी जोड़ा गया है , जिसने वक्त को समझ लिया , वक्त के अनुरूप चलना सीख लिया ,उसने अपने भाग्य को भी चमका लिया ।


 जीवन में वक्त के अनुरूप ढलना, उसका सदुपयोग करना, हमें उन्नति, तरक्की और सफलता  तो अवश्य मिलती है लेकिन उसमें अहंकार का समावेश कभी नहीं होना चाहिए। 


 एक कामयाब व्यक्ति वक्त की महत्ता समझते हुए कल्याणकारी भावना को भी आत्मसात करता है । हमें यह भी मानकर चलना चाहिए कि समय से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं है । यह समय ही है जो हमें धन, समृद्धि और खुशी प्रदान करता है । 


 वक्त अपना है तो सब कुछ अपना है यह सोच मनुष्य को स्वार्थी और आत्म केंद्रित भावना से घेर लेती है । इस प्रकार की सोच केवल अपना ही विकास चाहती है अपनी ही उन्नति चाहती है  और पर- कल्याणकारी भावना से सदैव वंचित रहती है ।


 शीला सिंह,

 बिलासपुर ,हिमाचल प्रदेश ।🙏



मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...