Wednesday, October 21, 2020

स्वार्थ रहित जीवन

 मानव जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है  शास्त्रों में भी यही कहा गया है कि साै हाथों से कमाने और हजार हाथों से दान करने की नीति  की प्रवृत्ति हर मनुष्य को अपनानी चाहिए । युग निर्माण संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है ।

 मिल बांट कर खाना, सभी का सहयोगी बने रहना परोपकार की भावना के आधार पर जीवन जीना सर्वश्रेष्ठ माना गया है । स्वार्थ रहित जीवन जीने को सर्वोत्तम जीवन माना गया है । 

स्वार्थी भावना सदैव सद्गुणों की शत्रु रही है । मनुष्य आत्म केंद्रित जीवन जीता हुआ केवल आत्म सुख की लालसा रखता है । घर परिवार समाज व राष्ट्र के लिए अनुपयोगी ही रहता है । 

सार्थक जीवन से परे रहकर ईर्ष्या द्वेष अलगाववाद जैसे दुर्गुणों से घिरा रहता है ।  

मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है बार-बार नहीं मिलता। प्रेरणादाई जीवन सभी के लिए अनुकरणीय बनता है  ।इस संसार में सत्कर्म ,परमार्थ और उपकार के अनेक  कार्य है मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए सदैव मानव कल्याण की भावना से ओतप्रोत जीवन होना चाहिए। 

 सत्कर्म सद्भावना रहित केवल ढोंग ही माना जाता है । परमार्थ का आडंबर  न  अपना कर वास्तविक उपकारी भाव अपनाना सदा श्रेयकर रहता है । संसार में आज बुराइयां इसलिए बढ़ रही हैं या फल-फूल रही है क्योंकि  अधिकतर मानवता स्वार्थ के घेरे में गिरी हुई है । परमार्थ के बल पर बड़ी-बड़ी संस्थाएं, धर्म प्रचारक  झूठ और दिखावे का आवरण ओढ़ कर ज्ञान बांट रहे हैं  भीतरी ज्ञान खोखला है  स्वार्थ की भावना तीव्र है । झूठ ,बेईमानी और व्यभिचार पर नियत टिकी है । झूठी शान अपनी चमक बिखेर रही है पर्दे के पीछे पाप पनप रहा है । मर्यादाहीन और बे हयाई जीवन का प्रयाय बन चुका है । बेईमानों की भीड़ में जन हितेषी ढूंढना मुश्किल है ।

 इसके विपरीत स्वार्थ रहित जीवन सर्वश्रेष्ठ श्रेणी में आता है । स्वार्थ रहित व्यक्ति परमार्थ और परोपकार की भावना की परिभाषा को भलीभांति समझता है । जनकल्याण के आधार पर जीवन की सार्थकता को मुख्यता देता है । आडंबर और दिखावे से दूर रहकर केवल और केवल कल्याणकारी भावना को अपनाता है । अतः स्वार्थ से दूर रहकर ही जीवन श्रेष्ठ कहलाता है ।

  शीला सिंह

 बिलासपुर

 हिमाचल प्रदेश🙏

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