' विनम्रता '
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विनम्रता हृदय का भाव है ।विनम्रता श्रद्धा और विश्वास की अनुगामिनी होती है ,जिसका सीधा संबंध मन से जुड़ा है । विनम्रता का भाव व्यक्ति के हृदय में उपजता कैसे है ? सर्वप्रथम यह जानना बहुत जरूरी है । यह गुण अथवा लक्षण व्यक्ति में जन्मजात या पारिवारिक विरासत में भी मिले हो सकते हैं तथा समाज व संस्कृति के प्रभाव से स्वतः भी उत्पन्न हो सकते हैं ।व्यक्ति का विनम्र व्यवहार उसे दयालु ,उदार और परोपकारी बनाता है । विनम्रता का महत्व वही व्यक्ति समझ सकता है जो अहंकार विहीन हो क्योंकि अहंकारी व्यक्ति आतमहित का सदैव पक्षधर होता है ।वह समाज के लिए अनुपयोगी ही रहता है । अहंकार सदा दूसरों की निंदा, आलोचना ,बुराई करवाता है ।प्रतिशोध की भावना पनपती है ।बुद्धि को कुंठित कर देता है ।व्यक्तित्व को संदेह युक्त बना देता है । इसके विपरीत विनम्र व्यक्ति सह-अस्तित्व के साथ आगे बढ़ता है ।विनम्रता व्यक्ति में श्रेष्ठ गुणों का विकास करती हैं उसे शिष्ट बनाती हैं वह शिष्टता ,सौहार्द और शालीनता अपनाता हुआ अच्छे व्यवहार का समाज में उदाहरण प्रस्तुत करता है । विनम्रता व्यक्ति में सहनशीलता और धैर्य जैसे गुणों का भी विकास करती हैं ।सहनशील व्यक्ति सहजता से दूसरों की बात सुनता है तथा प्रतिक्रिया करता है ।धैर्यशील व्यक्ति क्रोध को अपने वश में कर लेता है तथा किसी विषय पर बिना सोचे अपनी तत्परता नहीं दिखाता ।विनम्रता का भाव यदि ह्रदय से जुड़ा है तो इसके प्रति पूर्ण समर्पित आस्था बहुत जरूरी है ।विनम्र भाव दिखाने के पीछे दिखावा नहीं होना चाहिए ।बनावटीपन नहीं होना चाहिए ।केवल अभिनय करके हम किसी की सहानुभूति यदि प्राप्त करते हैं तो वह दीर्घ जीवी नहीं होती शीघ्र ही टूट जाती है । विनम्रता को हास परिहास की छाया से भी दूर रखना चाहिए ।अहितकारी भावना इसका स्वरूप बिगाड़ देती है । आति विनम्र होना व्यक्ति के लिए हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है ।उसके अधिकारों का हनन हो सकता है ।चापलूस व्यक्ति अपने मतलब के लिए उसका दुरुपयोग कर सकता है । शक्तिशाली लोग किसी विनम्र को भ्रम वश यह भी मान लेते हैं कि अमुक व्यक्ति हमारी शक्ति से डर कर ही विनय प्रदर्शन कर रहा है । इसलिए विनम्रता के साथ समय ,स्थिति और वातावरण अनुकूल संबंधित विषय के प्रति सही परख ,तजुर्बा ,अनुभव का होना अति आवश्यक है । भले ही विनम्रता श्रेष्ठ सभ्य गुण है लेकिन उसके आत्म बल में उर्जा का अनवरत संचार आवश्यक है । अंत में यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि विनम्र होने का अभिप्राय दीन हीन होना भी नहीं है वास्तव में विनम्र व्यक्ति को मानसिक ,आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से ज्यादा वरिष्ठ व मजबूत होने की जरूरत है । अतः विनम्रता व्यक्ति के व्यवहार और स्वभाव की एक संभव विशेषता है जो मृदुलता का आवरण ओढ़े हुए होती है ।
शीला सिंह
बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश🙏
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