"समुद्र को सीख"
जिन किनारों ने बांध रखा है समुद्र को अपनी सीमाओं में,
घाव की वेदना उनको भी सहनी पड़ी है सदियों सदियों से ।
डूब जाती है वह कश्तियां बीच मझधार में,७
दमन समुद्र का पकड़ जीती है जो एहसास में ।
किनारे चाहे कितनी भी मजबूती में खड़े हो,
धाराओं को अपने आंचल में समेटे अड़े हो ।
समुद्र की उथल-पुथल जब हाहाकार मचाती है,
अपने अस्तित्व को खोकर धारा को भटकाती है ।
मोड़ देती है विपरीत दिशाओं में दिशाहीन बनाकर,
किनारों को दफन कर जाती है अंतहीन क्रूरता अपनाकर ।
जब वेग शांत हो जाता है सब कुछ बर्बाद हो जाता है,
टूटा किनारा भी फिर अपनी शक्ल में कहां आ पाता है?
ए समुद्र ना कर गुरुर अपने इस मिथ्या पर पर,
उन नदियों की भागीदारी मत भूल जो करती तुम्हें सबल ।
वहां जननी सहस्त्राें सफर तय कर करती तुम्हें पोषण,
भंडारण स्थापित कर ना कर बंधन का तू शोषण ।
कितने सपनों को तोड़ा, सहस्त्र प्राणों से खेला है,
विस्तृत ,विशाल आकार पाकर भी तू अकेला है ।
नदियां गतिशील है धारा के प्रवाह में बहती है,
मानव समाज सबका सिंचन, कहानी को बयां करती है ।
किनारों के बंधन में बहना और अनुशासन सिखाती है,
औरों पर समर्पित है, आत्मचिंतन कहां कर पाती है ?
धन्यवाद ।
स्वरचित कविता ।
शीला सिंह
अध्यक्षा
महिला साहित्यकार संस्था जिला बिलासपुर इकाई हिमाचल प्रदेश ।
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