Thursday, October 22, 2020

समुद्र को सीख

 "समुद्र को सीख"


 जिन किनारों ने बांध रखा है समुद्र को अपनी सीमाओं में,

 घाव की वेदना उनको भी सहनी पड़ी है सदियों सदियों से ।

 डूब जाती है वह कश्तियां बीच मझधार में,७

 दमन समुद्र का पकड़ जीती है जो एहसास में ।

 किनारे चाहे कितनी भी मजबूती में खड़े हो,

 धाराओं को अपने आंचल में समेटे अड़े हो ।

 समुद्र की उथल-पुथल जब हाहाकार मचाती है,

 अपने अस्तित्व को खोकर धारा को भटकाती है ।

 मोड़ देती है विपरीत दिशाओं में दिशाहीन बनाकर,

 किनारों को दफन कर जाती है अंतहीन क्रूरता अपनाकर ।

 जब वेग शांत हो जाता है सब कुछ बर्बाद हो जाता है,

 टूटा किनारा भी फिर अपनी शक्ल में कहां आ पाता है?

 ए समुद्र ना कर गुरुर अपने इस मिथ्या पर पर,

 उन नदियों की भागीदारी मत भूल जो करती तुम्हें सबल ।

 वहां जननी सहस्त्राें सफर तय कर करती तुम्हें पोषण,

 भंडारण स्थापित कर ना कर बंधन का तू शोषण ।

 कितने सपनों को तोड़ा, सहस्त्र प्राणों से खेला है,

 विस्तृत ,विशाल आकार पाकर भी तू अकेला है ।

 नदियां गतिशील है धारा के प्रवाह में बहती है,

 मानव समाज सबका सिंचन, कहानी को बयां करती है ।

 किनारों के बंधन में बहना और अनुशासन सिखाती है,

 औरों पर समर्पित है, आत्मचिंतन कहां कर पाती है ?


 धन्यवाद ।

 स्वरचित कविता ।


 शीला सिंह

अध्यक्षा 

 महिला साहित्यकार संस्था जिला बिलासपुर इकाई हिमाचल प्रदेश ।

No comments:

Post a Comment

मैं पढ़ने जाऊ़ंगी

 'बाल कविता'  ------------------ मां मैं भी पढ़ने पाठशाला जाऊंगी ज्ञान पा मैं पढ़ी-लिखी कहलाउंगी घर का सारा काम भी  मैं  करूंगी अच्छ...