यह कथन बिल्कुल सही है कि 'घमंड का अंकुर अज्ञान से ही फूटता है ।'
घमंड वह अंहकारी भाव है ,जो किसी व्यक्ति द्वारा अपनी किसी वस्तु ,संपदा, प्रतिभा ,गुण पर रोबदार प्रदर्शन , जो अंह से भरपूर होता है ,घमंड कहलाता है।
घमंड तुच्छ, घृणित एवं नकारात्मक सोच का परिणाम है जिसके मूल में अज्ञानता की बहुलता होती है ।
व्यक्ति अपने आप को औरों से बहुत अधिक योग्य , समर्थ , सक्षम ताकतवर या बढ़कर समझने लगता है ।बनावटी ओछा प्रदर्शन करता है । अपनी बढ़ाई स्वयं ही करता है । आत्म प्रशंसा का भूखा होता है । दूसरों की प्रशंसा सहन न करके केवल अपनी ही प्रसिद्धि बिखेरने का पक्षधर होता है ।
घमंड एक बुराई है जिसे अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है । सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठता दर्शाते हुए जाति का घमंड ,आर्थिक स्तर पर उच्चता दर्शाते हुए पैसा, धन का ,संपत्ति का घमंड । गुण, प्रतिभा की महानता दर्शाते हुए ज्ञान का घमंड । नश्वर शारीरिक सौंदर्य पर घमंड ।
घमंड किसी भी प्रकार का हो उसका मूल अज्ञानता ही है । अज्ञानी व्यक्ति समाज को भेदभाव में बांटता है ,धन के नशे में चूर व्यक्ति दिशाहीन होकर अमर्यादित जीवन जीता है । अपने ज्ञान पर घमंड करने वाला व्यक्ति सदैव नकारात्मक सोच में ही घिरा रहता है । ज्ञानी होते हुए भी अज्ञान के अंधकार में डूबा रहता है ।
घमंड व्यक्ति को सामाजिकता के महत्व से अनभिज्ञ रखता है। घमंड भाईचारे का दुश्मन है ।अज्ञानता वश अनमोल रिश्तो के सानिध्य से वंचित रह जाता है । अतः आत्म सुधार नीति को अपना कर ,श्रेयकर जानते हुए अपनी अज्ञानता की सीमा को भी जानना जरूरी है और वही सच्चा ज्ञान है ।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश।🙏
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