गुस्सा अथवा क्रोध मानव के लिए हानिकारक है ।यह किसी भी व्यक्ति की कायरता को दर्शाता है और धैर्य हीनता का सूचक है।
परिस्थितियों से सामना न कर पाना , उनके अनुरूप स्वयं को न ढाल पाना, सहनशीलता और धैर्य की कमी का होना, सनकीपन, हीन भावना जैसे बुरे भाव मनुष्य में क्रोधी प्रवृत्तियां पैदा करते हैं ।
क्रोध का आवरण मनुष्य की तार्किक मानसिक दशा को भ्रष्ट कर देता है । व्यक्ति सही गलत का निर्णय नहीं ले पाता । वह अवसाद का शिकार हो जाता है अपना शत्रु स्वयं बन जाता है अपनी ही जीवन लीला समाप्त करने के मौके ढूंढता है आैर अंतत: इस परिणाम तक पहुंच भी जाता है ।
यह सब क्रोध और निराशा का मिश्रण ही है । क्रोध अथवा गुस्सा भले ही कुछ पल का होता है मगर उसके परिणाम भयानक ही होते हैं । व्यक्ति आत्महत्या करने जैसे दुखद कदम भी तभी उठाता है जब वह एकाकी अर्थात अकेला जीवन यापन कर रहा हो, परिवार से वंचित हो, समाज से बहिष्कृत हो , तिरस्कृत हो, अवसाद में घिरा हुआ हो ,हर तरफ निराशा ही निराशा हो और मन मस्तिष्क में क्रोध का वास हो जाए ।
वह क्षणिक क्रोधित पल व्यक्ति के लिए अत्यंत घातक होता है , जब वह स्वंय को ही खत्म कर लेता है । आज वर्तमान परिस्थितियां ऐसी बन चुकी है कि मनुष्य क्रोध, निराशा और अवसाद में घिरा हुआ है और आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है ।
अतः आज जरूरत है श्रेष्ठ जीवन सिद्धांतों की ,उच्च जीवन शास्त्र नियमों को अपनाने की , शुद्ध आचरण अपनाने की, पारिवारिक संयुक्तता के महत्व को जानने की तथा मानव मात्र के हृदय में प्रेम , स्नेह की ज्योति जगाने की।
शीला सिंह
बिलासपुर,
हिमाचल प्रदेश ।🙏
बहुत अच्छा विश्लेषण, बधाई की पात्र
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