मातृ भाषा अर्थात मां की भाषा जिससे प्रत्येक बच्चे का लगाव और स्नेह जुड़ा होता है ।
मां अपने बच्चे को कभी इशारों से तो कभी तोतली भाषा में सिखाने का प्रयास करती है।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वह अपनी मातृभाषा को पूरी तरह से सीख जाता है ,हर बात आसानी से समझ लेता है , विचारों को व्यक्त कर लेता है ।
बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा यदि मातृभाषा में हो तो वह बहुत सहजता से सीख पाएगा।
मां उसकी प्रथम गुरु तथा परिवार प्रथम पाठशाला होती है ,मातृभाषा से बच्चा परिचित होता है उसे समझने में और ग्रहण करने में सफलता मिलती है ।
घर परिवार में जिस भाषा में बातचीत करते हैं वही भाषा बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा के लिए लाभप्रद मानी जाती है ।
इसके अलावा मातृ भाषा हमारी संस्कृति को पुष्ट भी करती है और संस्कारों की नींव भी मजबूत करती है ।
अपनी बाेल चाल में दिए गए संस्कार , सीख बच्चे शीघ्र आत्मसात करते हैं ।
परिवार में बड़े बूढ़ों का अच्छा व्यवहार , सकारात्मक सोच श्रेष्ठ विचारों को जन्म देते हैं ।
इन सब का आधार मातृभाषा ही होती है ।
अतः प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए क्योंकि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा का उसके जीवन में विशेष स्थान है , यह उसकी विशेष अवस्था है जब वह शिक्षा की सीढ़ी के प्रथम पायदान पर अपना कदम रखने जा रहा होता है ।
शिक्षा का आगामी क्रम यहीं से शुरू होता है । शिक्षा क्षेत्र की पृष्ठभूमि को मातृभाषा बल प्रदान करती हैं ।
पाठशालाओं में ,शिक्षण संस्थाओं में, शिक्षा का माध्यम चाहे हिंदी हो या अंग्रेजी विद्यार्थी का आधार मजबूत होना चाहिए ।
इसीलिए अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा का विशेष महत्त्व है। समय के वेग में ढलने हेतु अन्य भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी है । उच्च शिक्षा प्राप्ति में अंग्रेजी भाषा का अपना महत्व है । लेकिन उसमें भी विद्यार्थी पारंगत तभी होगा जब उसका मूल आधार बलिष्ठ होगा। इसके लिए मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा अति आवश्यक है ।
शीला सिंह
बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश ।🙏
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