मानव जीवन में आज तक सांसारिक सुखों की खोज कभी पूरी नहीं हो पाई ।सुखी जीवन अथवा जीवन में खुशी पाने के लिए व्यक्ति प्रयास करता रहा है
।सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं जो हमारे कर्मों के परिणाम स्वरूप हमें मिलते हैं ।
सांसारिक खुशी भौतिक या मानसिक दो स्वरूप में देखी जा सकती है ।
भौतिक सुख साधनों की कमी भी दुख का कारण बनती है । अपेक्षाओं से अधिक इच्छाओं का पालना भी दुख का कारण बनता है ।
व्यक्ति जब अपनी मेहनत से सुखाें का भंडार संजोता है तो आत्म संतुष्टि का अनुभव करता है ।विरासत में मिला हुआ जीवन का सुख मनुष्य को श्रम हीन, कृतज्ञहीन बना देता है क्योंकि वह उस श्रमभाव से अपरिचित रहता है । दुर्भाग्यवश जब उन सुख साधनों में कमी आ जाती है तो मनुष्य अपने आप को दीन -हीन और दुखी समझने लगता है ।भोगा हुआ सांसारिक सुख, दुख में परिवर्तित हो जाता है ।
किसी कार्य के प्रति कर्मठता, लगन और ईमानदारी सफल परिणाम देती है , सुख की अनुभूति प्रदान करती है ।
जीवन में कुछ अच्छा करने का भाव खुशी प्रदान करता है । कोई भी श्रेष्ठ ,भला कर्म, परोपकार की भावना से युक्त किया गया करम , हमें खुशी प्रदान करता है । क्योंकि इसके पीछे स्करात्मक सोच भी होती है । हर विपरीत अथवा बुरा व्यवहार या कर्म के पीछे मनुष्य की नकारात्मक और हीन भावना कार्य करती है । माेह से घिरा व्यक्ति भी अपने जीवन में दुख के बीज स्वयं बोता है । परिवारिक माेह ,संतान मोह व्यक्ति के लिए सुखकर तो होते हैं ,परंतु अंततः जब उपेक्षा का भाव मुखर हो जाता है तो दुखों की उत्पत्ति करता है । यह मानना सही है कि सांसारिक सुखों का परिणाम दुख ही है लेकिन स्थिरता ,संतोष ,धैर्य जैसे गुणों के आधार पर विपरीत परिस्थितियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।
कहा भी गया है 'संसार दुखों का घर है '। मगर गृहस्थ जीवन अपनाते हुए संसार को छोड़ा भी नहीं जा सकता । जरूरत है जीवन में कुछ आदर्शों ,सिद्धांतों को अपनाने की। सुख-दुख को समभाव मानने की ।
शीला सिंह
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश
🙏
Very nice
ReplyDeleteउचित
ReplyDeleteVery nice
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