1.
कैसी आँधी छा रही, धिरती संकट जान।
प्रश्न मनमें कौंध रहे, चाहते समाधान।।
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2.
जीवन बनता प्रश्न है, प्राण गये है हार।
हरपल तेरी ओट है, जग के पालनहार।।
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3.
कलयुग का यह प्रश्न है, बढ़ता पापाचार।
गोरख धंधा फैलता,पनप रहा व्यापार।।
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4.
मानुष जंगल काटता, मिटता जग श्रृंगार।
प्रकृतिहि करती प्रश्न है, भटके जीवन तार।।
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5.
उलझा सबकुछ आज है, उपजे पलपल प्रश्न।
साँसे उखड़ी जा रही, मौन होते जश्न।।
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शीला सिंह बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏
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