Monday, May 31, 2021

दुविधा

 विधा-- गीत 

चौपाई छंद --पर आधारित 

मात्राभार --16,

सृजन शब्द -- *दुविधा*  

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दुखड़ा मन  का  किसे सुनायें। 

*दुविधा* मानुष बढ़ती जाये। 

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आशा  का विश्वास  जला है ।

साँसों का  व्यापार  चला  है ।

मर्यादा  रुप  बेशर्मी  का ।

घातक प्रहार अधर्मी हि का। 

समाधान अब  कैसे  पाये  ।

दुविधा मानुष बढ़ती जाये । 

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मारुत जहर बांटती जाती ।

उड़ती प्राण हांकती जाती ।

तन्त्र आहत आप हुआ है  ।

पीठ कुठाराघात  हुआ  है  ।

जन मन कूफर भय फैलाये। 

दुविधा मानुष  बढ़ती  जाये। 

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हे जग  रक्षक  पालनहारी ।

करो  कृपा प्रभु हितकारी  ।

छंट जाये अब धुँआ  काला। 

शान्त बने फिरहि क्रूर ज्वाला। 

कंटकी  धार  शूल  बढ़ाये । 

दुविधा मानुष बढ़ती जाये ।

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दुखड़ा  मन का  किसे सुनायें । 

*दुविधा* मानुष बढ़ती जाये ।

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शीला सिंह बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

दोहे। सृजन शब्द --प्रश्न

 


1.

कैसी आँधी छा रही, धिरती संकट जान। 

प्रश्न मनमें कौंध रहे, चाहते समाधान।।

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2.


जीवन बनता प्रश्न है, प्राण गये है हार। 

हरपल तेरी ओट है, जग के पालनहार।।

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3.

कलयुग का यह प्रश्न है, बढ़ता पापाचार। 

गोरख धंधा फैलता,पनप रहा व्यापार।।

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4.

मानुष जंगल काटता, मिटता जग श्रृंगार। 

प्रकृतिहि करती प्रश्न है, भटके जीवन तार।। 

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5.

उलझा सबकुछ आज है, उपजे पलपल प्रश्न। 

साँसे उखड़ी जा रही, मौन होते जश्न।। 

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शीला सिंह बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

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