विधा-- गीत
चौपाई छंद --पर आधारित
मात्राभार --16,
सृजन शब्द -- *दुविधा*
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दुखड़ा मन का किसे सुनायें।
*दुविधा* मानुष बढ़ती जाये।
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आशा का विश्वास जला है ।
साँसों का व्यापार चला है ।
मर्यादा रुप बेशर्मी का ।
घातक प्रहार अधर्मी हि का।
समाधान अब कैसे पाये ।
दुविधा मानुष बढ़ती जाये ।
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मारुत जहर बांटती जाती ।
उड़ती प्राण हांकती जाती ।
तन्त्र आहत आप हुआ है ।
पीठ कुठाराघात हुआ है ।
जन मन कूफर भय फैलाये।
दुविधा मानुष बढ़ती जाये।
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हे जग रक्षक पालनहारी ।
करो कृपा प्रभु हितकारी ।
छंट जाये अब धुँआ काला।
शान्त बने फिरहि क्रूर ज्वाला।
कंटकी धार शूल बढ़ाये ।
दुविधा मानुष बढ़ती जाये ।
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दुखड़ा मन का किसे सुनायें ।
*दुविधा* मानुष बढ़ती जाये ।
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शीला सिंह बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏